शनिवार, 27 सितंबर 2014

माँ का फैसला



रमजान का पाक महिना था, हर कोई खुश और व्यस्त था. मस्जिद के आस पास खुब चहल पहल थी. खाने पीने की छोटी छोटी दुकाने सजी थी जिनमें जलेबी, पापड़, कीमे के समोसे तथा और बहुत सारी खाने की चीजें सजी थी. नमाज अदा कर निकलते बच्चे बूढ़े, जवान सर पर टोपियां पहने खुश नजर आ रहे थे. रोजे खुलने के वक्त पर सभी लोग घरो मे दुबक जाते, एक दुसरे के घरों में सजी धजी थालियों में पकवानो का अदान प्रदान हो रहा था. 

मस्जिद से अजान की आवाज आने पर फ़रिदा का ध्यान हटा और वह सिर पर दुपटटा रखकर नमाज पढ़ने लगी, तभी दरवाजा खटखटाने कि आवाज आई. फरीदा के उठते उठते खटखटाने की आवाज तेज होने लगी थी. फ़रिदा ने जैसे ही दवाजा खोला तो देखा की उसका बेटा इमरान बदहवास सा दरवाजे पर खड़ा था, जैसे ही दरवाजे के पट खुले इमरान घबराया सा दौडते हुये अन्दर आया और अन्दर से कुंडी लगा ली. गुस्से मे तमतमाते हुये इमरान ने कहा इतनी  देर से दरवाजा पीट रहा था दरवाजा क्यो नही खोल रही थी? नमाज पड रही थी बेटा फ़रिदा ने कहा. इमरान ने अपने डर पर काबु पाते हुये कहा, अम्मी कोई आये तो किवाड मत खोलना और मैं घर में हुँ यह भी मत बताना. इमरान बुरी तरह से परेशान था. फ़रिदा आज भी समझ गयी कि उसका इकलौता बेटा कोई गुनाह कर के आया है, तभी इमरान ने कहा अम्मी मैने कुछ नहीं किया, मैं सच कह रहा हुँ.......   तु चिन्ता मत कर बेटा मैं तुझे बचा लुंगी फ़रिदा ने कहा, तभी कहीं दुर से पुलिस की गाड़ी का  सायरन सुनाई दिया.

इमरान की सांस धौंकनी कि तरह चल रही थी, वह पसीने से नहा रहा था. अम्मी मैनें कुछ नही किया इमरान ने झुठ बोला....तो तु इतना क्यों डर रहा है जब तुने कोई गुनाह ही नही किया,   फ़रिदा ने कहा. देख इमरान तु ऐसे जुर्म करना छोड़ दे बेटा कब तक ऐसे पुलिस से डरता और भागता रहेगा?  सायरन की आवाज अब करीब आती जा रही थी...इमरान घर मे मुनासिब जगह देखकर छुप गया था. दरवाजे पर ठक ठक की आवाज़ से फ़रिदा भी डर गयी, अम्मी दरवाजा मत खोलना..इमरान ने रोका फ़रिदा ने दरवाजा खोल दिया, सामने पुलिस खडी थी, एक अफसर ने पूछा, ये घर इमरान का है? फ़रिदा ने हाँ मे सिर हिला दिया. कहाँ है वो? उसे हमारे हवाले कर दो नही तो हमें जबरन तलाशी लेनी होगी. पर साहब उसने किया क्या है? फ़रिदा ने मासूमियत से पुछा. इतनी भोली ना बन बुढ़िया अब तक तो छोटी मोटी चोरीयां, राहजनी करता रहता था पर इस बार उसने ऐसा काम किया है की जमानत भी नही होगी..खुदा के वास्ते एसा मत कहो साहब, फ़ारिदा ने हाथ जोड़कर  कहा. दो तीन सिपाही घर मे तलाशी लेने लगे, कहाँ छुपा रखा है उसे तभी पिछ्ला दरवाजा खुला दिखा... भाग गया साहब. भाग गया या तुमने उसे भगा दिया पीछे के रास्ते से? खुदा की कसम साहब रोजा है झुठ नही बोलूंगी वही भाग गया, फ़रिदा ने ईश्वर का वास्ता दे कर कहा तो पुलिस इन्सपेक्टर ने जाते जाते फ़रिदा को समझाया वो आये तो उसे पुलिस स्टेशन भेज देना वरना हमे उसे गिरफ़्तार करना होगा. वो किसी महिला के गले से सोने कि चैन छिनकर भाग रहा था पर वो चैन टुट गयी. हाँ साहब मै समझ गय़ी फ़रिदा की आँखों से आंसू छलक आये.

बुढ़ी माँ के जीने का एक मात्र सहारा, एकलौता बेटा था इमरान, शौहर तो कुछ साल पहले ही इस दुनिया से रुखसत हो गये. क्या खाक मेरे जीने का सहारा बनेगा, फरीदा ने बड़बड़ाते हुए सिर पर दुपट्टा रखा और नमाज पढने बैठ गई. दोनो हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआ माँगने लगी, आँखों से  लगातार आंसु बह रहे थे और दिल से फरियाद ...या अल्लाह मेरे बेटे को सही राह पर ला दो इसके बाद मैं आपसे कुछ नही मांगूंगी, वो चोर बनेगा मैंने सपने में भी सोचा था. उसके अब्बु की रूह  कितनी बेचैन होगी उसकी ये हरकतें देखकर, सोचते होंगे ...फ़रिदा तुमने बेटे की परवरिश अच्छी नही कि और वो चोर बन गया. 
 
 फ़रिदा के शौहर सरकारी मदरसे में उर्दु पढाते थे. उनके मरने के बाद फ़रिदा को पेन्शन मिलती थी जिससे वह अपना गुजारा कर लेती थी. रोजा खोलने वक्त हो गया था परन्तु फ़रिदा ने न तो कुछ बनाया था और नही कुछ खाने कि इच्छा थी, तभी अन्जुमन खाला आ गई जो फ़रिदा कि पडोसन है,  "फ़रिदा ले मैं कुछ खाना लाई हुँ अब रोजा खोल ले......

नही खाला मुझसे कुछ नही खाते बनेगा, भुख ही मर गयी है....

अल्लाह सबका भला करेगा सब्र रख फ़रिदा, अन्जुमन खाला ने समझाते हुए कहा ..खाला आप जब आती हो तो मन कुछ हल्का हो जाता है, फ़रिदा ने कहा....अच्छा बाद मे आती हुँ रोजा खोलना है खाला ने कहा और बाहर निकल गई. 

फ़रिदा कभी खाने को देखती तो कभी अपने बेटे के बारे मे सोचती. पता नही कहाँ मारा मारा फ़िर रहा होगा पता नहीं कुछ खाया भी कि नही.......भला मेरे मुह मे टुकड़ा कैसे जायेगा? 

फ़रिदा का बेटा इमरान 19 बरस का है, 10 जमात मे दो बार फ़ेल हो गया. होशियार होते ही छोटी बुरी सोहबत में पड गया और छोटी मोटी चोरियां करने लगा और अंत में दो साल लगातार फेल  होने के बाद मदरसा भी छोड दिया था. अब मुह्ल्ले मे आवारागरदी करता फिरता है.......खैर खुदा ने दुख तकलीफ़ के साथ साथ पेट भी दे दिया है तो खाना तो होगा ही....थोडा बहुत खाने के बाद फरीदा बचा खाना बेटे के लिये रख कर बिस्तर पर जा लेटी. निंद तो आँखों से कोसों दुर थी... समय से पहले बूढ़ा गई पथरीली आँखों से से घर कि छ्त को ताक रही थी, ये रात इतनी लम्बी क्यों है? सुबह कब होगी? ये सोचते सोचते आखिर उसे निंद आ ही गई.

इमरान तो रात भर नही आया पुलिस से डरकर कही छुपा होगा तभी पड़ोस का लड़का इमरान दोस्त दौड़ता दौड़ता आया और फरीदा से बोला "चाची इमरान जेल मे है...पुलिस ने उसे पकड लिया अकरम मुझे थाने ले चल मैं  छुड़ाउँगी अपने बेटे को फिर नेया जाने क्या मन में आया और गुस्से में मे बड़बड़ाती हुई बोली....मैं क्यों छुड़ाऊं? वहीं जेल मे सड़ने देती हुँ  कम से कम शान्ति तो रहेगी, पर उसके सीने में एक माँ का दिल भी था जो कमजोर हो गया था सो थाने जाकर अकरम की जमानत करवाई.   

पुलिस ने हिदायत दी.... अब सुधर जाओ अभी कुछ नही बिगडा है, आखिर कब तक ऐसे जुर्म करोगे? बेचारी मां कब तक  तुम्हे छुडाती रहेगी? साहब अब  मैं सही रास्ते पर चलूंगा, कोई गलत काम नही करूंगा मेरा विश्वास किजिए... इमरान ने कहा. फ़रिदा अपने साथ इमरान को घर लेकर आई, नहाने का पानी गरम किया. वो नहा रहा था तब तक फ़रिदा ने जल्दी जल्दी सब्जी रोटी बनाई और उसे खाना परोसा.

....नही अम्मी मैं नही खाउंगा, मैं रोजा रखूंगा, अब से कोई गुनाह नही करूंगा. ये पाक महीना है बेटा, इसमे लोग अच्छे काम करते हैं और तु तो गुनाह कर रहा है. फरीदा ने इमरान को समझाते हुए कहा ...तेरा पढने मे जी नही तो मैं तुझे कहीं काम पर लगवा दूंगी. इमरान ने हाँ मे सिर हिला दिया. कुछ ही दिनो मे फ़रिदा ने एक कपडे की दुकान पर बात करके इमरान को नौकरी करने के लिए भेजा. इमरान रोजाना ठीक समय पर दुकान जाता पर उसका मन नही लग रहा था. तनख्वाह तो 30 दिन काम करने के बाद उसे मिलने वाली थी पर उसे तो खुब सारे पैसे हाथ मे रखने की आदत थी.

एक दिन फ़रिदा पेटी खोलकर पैसे निकालने लगी तो देखा चार हजार में से दो हजार गायब थे उसने सोचा था ईद आने वाली है इमरान के लिए नए कपडे खरीदूँगी. पैसे कम देखकर उसका माथा ठनका, वो समझ चुकी थी कि इमरान ने घर के पैसों पर भी हाथ सॉफ कर दिया था. फरीदा  सोचने लगी.....इमरान सही राह पर कभी नही चल सकता. ये मेरी भुल है कि मैने उस पर यकिन किया.शाम को दुकान से लौटने पर फ़रिदा ने पुछा.....इमरान तुमने पेटी मे रखे पैसे लिये? हाँ  अम्मी इमरान ने सिर झुकाकर कहा तुम्हे क्यों चाहिये थे? और जरुरत थी तो तुम मुझसे मांग लेते, चोरी करने की क्या जरुरत थी? मैं तो समझ रही थी की तुम सुधर गये होंगे पर यह सोचना मेरी बहुत बड़ी भुल थी. तुम्हारे अब्बु की कितनी ईज्जत थी गांव में और तुम उनकी ईज्जत इस तरह से उछाल रहे हो. मैं तो थक गयी हुँ तुम्हें समझाते समझाते. फ़रिदा निढाल हो कर बैठ गई. इमरान के पास कोई जवाब नही था सो वह चुप ही रहा. फरीदा ने अपना बोलना जारी रखा ...तुम चाहो तो इस घर से जा सकते हो, मैं समझूँगी मेरा कोई बेटा नही है फ़रिदा ने कहा. अच्छा हुआ तुम्हारे अब्बु ये दिन देखने से पहले ही इस दुनिया से चले गए नहीं तो वो ये सब देखकर खुदकुशी कर लेते. मुझे भी अल्लाह ने ना जाने क्यों जिन्दा रखा है, काश मैं भी उनके साथ चली जाती तो अच्छा होता. 

फ़रिदा खाना बनाते बनाते बोल रही थी पर इस बार इमरान ने कोई झुठा आश्वासन नही दिया उठकर घर से चला गया. अजान होने पर फ़रिदा ने रोजा खोला, खाना खाने बैठी तो इमरान का चेहरा आँखों के सामने आ गया परन्तु इस बार उसने मन को कठोर किया, खाना खाया और बाहर आ कर खडी हो गई. 

आज चार दिन हो गये इमरान घर ही नही लौटा, परसों ईद है सब लोग खुशियां मना रहे हैं, तरह तरह के पकवान बनेंगे शीरा, खुरमा, सिवईयां, फेनी और तरह तरह की मिठाइयां. बच्चे औरतें सभी नये कपडे पहनेंगे. मै क्या तैयारी करूं ईद कि यह सोच कर फ़रिदा दुखी थी, किसी ने बताया इमरान दो लड़कों के साथ पकडा गया अभी जेल मे है. फ़रिदा को तो जैसे सब मालुम ही था, यही सब होगा पर इस बार उसका गुनाह वह जानना नहीं चाहती थी, चोरी ही की होगी इस बार भी, मोटर साइकिलें भी चुराकर बेचता था. 

उसने थाने मे जाकर पता किया तो मालुम हुआ उन तीन लड़कों ने किसी लड़की के साथ बलात्कार किया था. बयान देने के बाद लड़की अल्लाह को प्यारी हो गई. फ़रिदा ने सुना तो बेहोश हो गई, कुछ देर बाद जैसे तैसे होश मे आई. उसकी आँखों मे आंसु सूख चुके थे, एकदम पत्थर बन गई थी. जैसे ही उसे थोड़ी चेतना आई पुलिस अफसर से मुखातिब होकर बोली "साहब आप  को गलतफ़हमी होगी, मेरा इमरान चोरी करता है पर ऐसा घिनौना काम नही कर सकता है. फ़रिदा ने रुंधे गले से कहा.... कोई गलतफ़हमी नहीं हुई है, हमें बिल्कुल सही जानकारी है तीनो ने अपना गुनाह थाने मे कुबुल किया है. फ़रिदा ने सुना तो ऐसा लगा जैसे अब कुछ नही बचा, सब खत्म हो गया. घर आ कर बेदम हो कर बिस्तर पर लेट गई. आज तो उसे नमाज पढ़ने की भी इच्छा नही हो रही थी.  सुबह ईद है पुरे मोहल्ले मे रौनक देखते ही बन रही थी, बच्चे बड़े सब नये नये कपड़े पहनकर, सिर पर सफेद टोपी लगाकर ईदगाह की ओर जा रहे थे,  सिवईयों की खुशबु ईलाइची के साथ मिलकर पुरे वातावरण को मीठा बना रही थी, उसे भी उत्साह था ईद का....... इमरान के नये कपडे बनवा लिये थे पर कौन पहनेगा? मैं किस खुशी मे त्यौहार मनाऊं?  फ़िर भी आस पडौस से सिवईयां और मिठाइयां आ चुकी थी. 

पुरा दिन ऐसे ही गुजर गया. इस बार उसने मन ही मन सोचा मैं भी कोर्ट मे जाउँगी, एक फैसला लेना है, एक ऐसा फैसला जिससे मेरे जमीर को तथा मेरे मरहूम शौहर की रूह को सुकून.

कोर्ट मे पेशी हुई, दोनो हाथों में हथकड़ी पहने तीनो लड़के खड़े थे फ़रिदा जैसे ही उसके पास पहुंची इमरान बोला... अम्मी मुझे बचा लो, बचा लो अम्मी अब ऐसा कुछ नहीं करूंगा. इमरान रोते रोते गिड़गिडा रहा था....गलती हो गई अम्मी तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूंगा.

लेकिन इस बार फ़रिदा चुप थी, पानी सिर से उपर हो चुका था, कुछ लोग कानाफ़ुसी कर रहे थे कैसी माएँ होंगी जिन्होनें ऐसे जल्लाद बेटों को जन्म दिया.... फ़रिदा के कानों मे ये शब्द ऐसे जा रहे थे मानो किसी ने कानों में पिघला शीशा डाल दिया हो. तीनों अपराधी कठघरे में खडे थे, जज साहब आ चुके थे, आज पुरी अदालत खचाखच भरी थी एक संगीन जुर्म का फ़ैसला जो होना था लड़की की मां बददुआ दे रही थी, उसके आंसु झर झर बह रहे थे......मेरी बेटी की आत्मा को शान्ति तभी मिलेगी जब इन राक्षसों को फांसी मिलेगी

फ़रिदा अचानक खडी हुई और बोली जज साहब मुझे कुछ कहना है........जज साहब ने कहा आपको जो भी कहना है विटनेस बाक्स मे आ कर कहें. जैसे ही फ़रिदा कठघरे मे पहुची एक बार उसकी आँखें अपने बेटे पर पड़ी इमरान की आँखों में राहत पहुंची उसे लगा जैसे मां आ गई है और उसे अपने आंचल में छुपा लेगी, सजा से बचा लेगी. 

जज साहब ये मेरा बेटा है पर उससे पहले ये एक संगीन अपराधी है इमरान ने सुना तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई, अपनी मां को ऐसे देख रहा था जैसे बकरा कसाई को देखता है..... एक निरीह जानवर की तरह मायुस होकर वह मां को याचना भरी नज़रों से देख रहा था.....फरीदा अपनी रौ में बोले चली जा रही थी......जज साहब अगर मेरी औलाद ने इतना संगीन जुर्म किया है तो उसे फांसी मिलनी ही चाहिए. उसका जिन्दा रहना दुनिया के लिये खतरनाक है...जज साहब इसको फांसी पर लटका दिजिए, ताकि समाज मे ऐसा अपराध करने से लोग डरें

मेरा बेटा चोरी करता था तब तक ठीक था पर आज इसने वो गुनाह किया है जो माफी के काबिल नहीं है मै एक मां हुँ, और समझ सकती हुँ उस मां की पीड़ा को जिसकी बेटी के साथ यह घिनौना गुनाह हुआ....उस मा पर क्या गुजर रही होगी. मैनें तो मेरा बेटा उसी दिन खो दिया था जिस दिन उसने ऐसा गुनाह किया.

इमरान बचने की उम्मीद छोड सिर नीचा करके रो रहा था. कठघरे से उतरकर फ़रिदा अदालत में  बैठ गयी, लोग उसके बयान पर तालियां बजा रहे थे. अदालत से बाहर निकली फ़रिदा एक ऐसे अपराधी की मां थी जिसे फांसी हो रही थी

या अल्लाह मुझे ताकत देना की मैं इस गम को सह सकूं, गम ये नहीं है की आज मेरा बेटा फांसी पर चढ़ रहा है बल्कि गम ये है की मेरी कोख ने ऐसे जालिम को जन्म दिया........फ़रिदा के दिल पर पडा पत्थर हट चुका था और आज वो खुलकर सांस ले पा रही थी..... धीरे धीरे भारी कदमों से वह अपने घर की ओर बढ रही थी........... अब वह इस दुनिया में अकेली थी.......नितांत अकेली.

                                                         
                                                               कविता भालसे 
                                                               27 सितंबर 2014

2 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय कविता जी,
    आपकी सभी कहानियां बहुत अच्‍छी है और आपके लेखन में प्रवाह है। घुमक्‍क्‍ड़ डॉट कॉम पर आपकी और मुकेशजी की सभ्‍ाी पोस्‍ट पढ़ी है और मुझे आप दोनों की ही सारी पोस्‍ट बहुत पसंद आई है।
    लिखते रहिए।

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  2. कविता कुछ ग्रामर की कमी है इस कहानी में जैसे कोई संवाद बोल रहे हे हैँ तो ---” इसका होना बहुत जरुरी है एक उदाहरण जैसे -- आपने लिखा है और यह शब्द यू होने थे _____
    गुस्से में तमतमाते हुए इमरान ने कहा __” इतनी देर से दरवाज़ा पिट रहा था क्यों नहीं खोल रही थी” ”नमाज़ पढ़ रही थी बेटा ” फ़रीदा ने कहा । इमरान ने अपने डर पर काबू पाते हुए कहा --”अम्मी, कोई आये तो किवाड़ मत खोलना और मैँ घर में हूँ यह भी मत बताना ”
    ये संवाद को अलग करते हैं । और कहानी को पढ़ने में मुश्किल नहीं होती । कहानी बहुत अच्छी लिखी है कविता । पर थोड़ी ग्रामर पर ध्यान देना जरुरी है । जैसे कहाँ पर पूर्ण विराम है कहाँ अल्प विराम है और कहाँ पर आश्चर्य है । ओके

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