कमला आज बहुत ही खुश थी क्योंकि उसके पति रमेश ने आज अपने परिवार को राम लीला देखने ले जाने के लिये का वादा किया था। गांवों में मनोरंजन के साधन यही तो होते हैं रेडियो, नौटंकी या राम लीला। पास ही के गांव नेकपुर में मां दुर्गा का मेला लगा था, यह मेला मेला न होकर गांव वालों के लिये बहुत बड़ा उत्सव होता था दूर दूर के गांवों से ग्रामिण इस मेले का आनंद उठाने के लिये बैल गाड़ीयों में ठसा ठस भर कर कई किलोमिटर का सफ़र तय करके नेकपुर आते थे, क्या कुछ नहीं होता था नेकपुर के इस मेले में, छोटे बड़े तरह तरह के झुले, जादु का खेला, रंग बिरंगे मिट्टी के खिलौनों की कतारबद्ध दुकानें, बड़े बड़े तंबुओं से घीरे चलित सिनेमाघर, जलपान ग्रह से उठती गुड़ की जलेबियों की मदमस्त कर देने वाली खुश्बू, मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर फ़टफ़टी चलाते नौजवान, नौटंकी के टेंट से सटे लकड़ी के चबुतरे पर अपनी विचित्र भाव भंगिमाओं से दर्शकों को आकर्षित एवं आमंत्रित करतीं नर्तकियां........
कमला ने जल्दी जल्दी गाय का दुध दुह लिया. शाम का खाना बनाने बैठी तो खुशी के मारे उसके शरीर में कंपकंपी हो रही थी और उसकी रोटियां मन चाहे आकार ले रहीं थीं। इस संसार में हर व्यक्ति के लिये खुशी के मायने तथा परिभाषाएं अलग अलग होतीं हैं, सारा दिन खेतों में काम करने, गाय भैंसों की सेवा तथा घर के चुल्हे चौके में रमी रहने वाली कमला के लिये मेले में घुमने का प्रलोभन किसी दिवास्वप्न से कम न था।
अपनी बुढी सास के लिये शकरकंद उबालकर अब कमला चुल्हे पर दलिया चढाने की तैयारी कर रही थी। बुढिया के दांत तो सालों पहले इस नश्वर संसार को अलविदा कह चुके थे लेकिन जिव्हा उसकी बढती उम्र के साथ साथ यौवन के नए पायदान चढ रही थी, अत: कमला को घर गिरस्ती के अन्य कामों के अलावा अपनी स्वादु सांस की जिव्हा का भी पुरा खयाल रखना होता था, क्योंकि बुढिया घर पर ही रुकने वाली थी।
शाम हो चुकी थी और अब रमेश भी खेत से आ चुका था, रमेश तथा अपनी बारह साल की बेटी मुनिया को खाना परोस कर कमला भी वहीं चुल्हे के पास बैठ गई। मुनिया को मेले में जाने की खुशी में भात का स्वाद भी अच्छा नहीं लग रहा था, खाते खाते पुछने लगी -
मां राम लीला देखने कब जायेंगे?
पहले अच्छे से खाना खा लो फिर चलेंगे, कमला ने कहा।
कमला ने अपनी लाल रंग की चमकीली साड़ी निकाली और पहनकर आंखों में काजल लगाया, माथे पर चटख लाल रंग की बिंदी लगाई, लाल रंग की चुड़ीयां पहनीं और इस तरह कमला का श्रंगार पुरा हुआ, कई महीनों के बाद शायद आज तैयार हुई थी, एक भरपुर नज़र आइने पर डाली, अपने आप को निहारा और इठलाती हुई रमेश के सामने आई।
रमेश तो उसे देखता ही रह गया, जैसे पलक झपकाना ही भुल गया हो। उसे आज अपने आप पर गर्व मह्सुस हो रहा था. उसकी स्थिती उस कस्तुरी म्रग की तरह थी जिसकी नाभी में कस्तुरी छुपी होती है और वह उसे ढुंढने में पुरी जिंदगी लगा देता है।
अरे कमला आज तो तु बड़ी रूपवती लग रही है रे, रमेश ने छेड़नेवाले अंदाज़ में कहा।
मज़ाक मत करो....शर्माते हुए कमला ने कहा।
अरे नहीं रे, सच कह रहा हुं बड़ी सुंदर लग रही है।
धत्त....कमला ने शर्म से सर झुका लिया।
कमला, इस बार अच्छी फ़सल होगी ना तो तुझे सोने की झुमकीयां बनवा दुंगा.....रमेश ने कहा।
इतना सुनते ही कमला और भी प्रसन्न होकर चिड़ीयां की तरह फ़ुदकने लगी।
नौ बरस का छोटा मोहन भी मेला जाने के लिए मचल रहा था। दोनॊं बच्चों को तैयार करके अब कमला तथा रमेश अपनी बैल गाड़ी में जरुरत का समान रख रहे थे। पास पड़ोस के और भी परिवार मेला देखने जाने के लिये तैयार खड़े थे। शाम सात बजे तक सभी अपनी अपनी बैल गाड़ी में अपने परिवार के साथ सवार होकर नेकपुर की ओर चल दिये. अंधेरा हो चला था, गांव की गलियों से गुजरते हुए बैलगाड़ीयों का यह काफ़िला अब सुनसान पगडंडी पर आगे बढ रहा था. रात के सन्नाटे में बैलों के गले में बंधी घंटीयां कर्णप्रिय स्वरलहरियां छेड़ रही थीं।
ठीक समय पर काफ़िले ने नेकपुर की सीमा में प्रवेश किया, दुर से ही दिखाई देती मेले की तेज लाईटें और लाउड स्पीकरों का शोर सभी के मन में रोमांच पैदा कर रहा था, खास कर बच्चे तो ऐसे अधीर हुए जा रहे थे जैसे कुछ ही देर में वे नहीं पहुंचे तो सब कुछ खतम हो जाएगा, मेले का शोर सुनकर बैलों में भी एक नई स्फ़ुर्ती भर गई थी और अब वे भी जल्द से जल्द मेले में पहुंच जाना चाहते थे, और कुछ ही देर में वे सब मेले में थे।
मेले के बाहरी मैदान में बैलों तथा गाड़ीयों को बांधकर जब कमला, रमेश, मुनिया तथा मोहन मेले में घुसे तो सबके मन में एक अलग ही उत्साह व्याप्त था। बच्चों ने जीभर के झुले झुले, जलेबियां खाई, मौत का कुआं देखा, कमला ने अपने लिये कुछ साज श्रंगार का समान खरीदा तो बच्चों के लिये खेल खिलौने और जब इन सब क्रिया कलापों और वस्तुओं से मन भर गया तो सब राम लीला मैदान में अपने साथ लाये चादर बिछाकर राम लीला देखने बैठ गए और राम लीला का आनंद लेने लगे।
वापसी में दोनो बच्चे बैलगाड़ी में सो चुके थे, रात्री का दुसरा प्रहर था, अम्मा बाहर बरमदे में चार पाई पर बैठी थी, पास में एक डंडा था और चारपाई से सटकर रमेश का वफ़ादार कुकुर शेरू सो रहा था।
अम्मा तु सोई नहीं ? रमेश ने पुछा ?
नहीं बेटा, अब इस बुढापे में नींद कहां आती है, और फिर तुम लोग जब तक सकुशल घर नहीं पहुंचते मुझे नींद कैसे आ सकती थी भला, अब सोने की कोशिश करती हुं और बुढीय़ा सोने का उपक्रम करने लगी।
भोर होते ही कमला जाग उठी, रात नींद पुरी नहीं होने तथा सफ़र की थकान की वजह से उसका अंग अंग दुख रहा था लेकीन उस बेचारी की किस्मत में आराम कहां? रात जल्दी सोए या देर से सुबह उठकर घर के काम काज तो उसी को निबटाने होते थे।
रमेश भी अब नहा धोकर खेत पर जाने की तैयारी करने लगा।
सुनो जी, तनिक तिवारी पंडित जी से मिलते चले जाना, पुछना अब के बरस फ़सल कैसी होगी? कमला तु भी पुरी बावरी है री, अब फ़सल के आने में भला पंडित क्या करेगा ये सब तो भगवान के हाथों में होता है, और तु भली भांती जानती है कि तिवारी पंडित की भविष्यवाणी कितनी सच होती है। खैर, कमला की जिद के आगे घुटने टेकते हुए रमेश ने कहा ठीक है पूछ लुंगा.....
कमला ने दोनों बच्चों को तैयार करके गांव की प्राथमिक शाला में पढने के लिये रवाना किया और खुद अपने कामों में लग गई. रमेश भी खेत की ओर चल दिया। कमला ने गोबर निकाला, गाय का दुध निकाला, अम्मा को चाय बना कर दी, खाना तैयार किया और पोटली में खाना बांधकर खेत की ओर चल पड़ी. सारा दिन घर के कामों में खटर-पटर करती रहती कमला के पास इतना भी वक्त नहीं था की दो घड़ी अपने आपको आइने के सामने निहार ले।
दोनों पति पत्नि खून पसीना एक करके अपने खेत को सींचते, पुरी लगन एवं मेहनत से एक एक पौधे को निखरते क्योंकि यही फ़सल, यही पौधे तो इन खेतिहर ग्रामिणों की खुशियों के हरकारे होते हैं, फ़सल अच्छी आ गई तो वारे न्यारे और बिगड़ गई तो फ़ाके......
अपनी लहलहाती फ़सल को देखकर दोनों गर्व मिश्रित खुशी से फ़ुले नहीं समा रहे थे। कमला इस बार गेहुं चने की फ़सल जोरदार हुई है, और हां वो तेरे तिवारी पंडित जी ने भी तो कहा है की इस बार हमारी फ़सल खुब लाभ देकर जाएगी... रमेश ने कहा. शायद इस बार भगवान जी हम पर पुरी तरह मेहरबान हैं.......चरों ओर खुशियां बिखर रहीं थीं।

कमला ने पोटली से खाना निकाला। बेसन, मक्का की रोटी और मिर्ची का अचार.....दोनों ने साथ बैठकर प्रेम से खाना खाया और कुछ देर सुस्ताने की गरज से वहीं कुएं के पास पेड़ की छाया में दोनों लेट गए...
आसमान की ओर ताकते हुए रमेश बोला....
कमला, तु मेरा कितना खयाल रखती है रे.....मैं तो धन्य हो गया तेरे जैसी जोरु पाकर, न जाने कौन से पुण्य किये थे मैने पिछले जनम में जो तु मुझे मिली।
मुनिया के बापु, क्यों मुझे पाप में धकेल रहे हो इतनी तारिफ़ करके, आप भी तो मेरा कितना खयाल रखते हो....मैं भी बहुत खुश हुं, भगवान ने मुझे देवता जैसा पति दिया, प्यारे प्यारे बच्चे दिये और एक औरत को क्या चाहिये ?
नहीं कमला तु दिन रात घर के कामों में घिसती रहती है, और मैं तो तुझे इतने सालों में एक जोड़ी झुमके भी नहीं दिला सका, लेकिन देखना अबके बरस फ़सल के बाद तुझे शहर ले जाकर तेरी पसन्द के सोने के झुमके दिलवाउंगा।
कमला मंद मंद मुस्कुराते हुए आसमान की ओर अपलक ताक रही थी, नए झुमके पहनने का खयाल ही उसे रोमांचित कर देने के लिया पर्याप्त था, कमला की तंद्रा तब टुटी जब रमेश ने प्रेमातिरेक में उसे अपने मजबूत बाहुपाश में कैद कर लिया.......अरे हटिये ये क्या कर रहे हैं आप किसी ने देख लिया तो? और झटके से खड़ी हो कर घर जाने की तैयारी करने लगी।
कमला की आहट पाते ही अम्मा ने हांक लगाई, बहू....बहू, कहां हो ? कमला दौड़ती दौड़ती अम्मा की चारपाई के नजदिक पहुंची....हां अम्मा क्या हुआ?
अरी कुछ नहीं बहू, बहुत दिनों से हलवा नहीं खाया, बहुत मन कर रहा था, सो तेरे आने की ही बाट जोह रही थी, और हां बहु नरम नरम पुड़ीयां भी बना लेना.....ये मरी जीभ भी बहुत तंग करने लगी है, कुछ न कुछ खाने का मन करता रहता है।
ठीक है अम्मा शाम को बना लुंगी, घर में भगवान की किरपा से दुध, घी की तो कोई कमी न थी, घर की गाय जो थी।
शाम को दोनों बच्चे शाला से लौट आए, आते ही मुनिया ने हल्ला करना शुरु कर दिया, मां, मां बहुत जोर की भुख लगी है, जल्दी खाना लाओ।
हां बेटा तुम लोग हाथ मुंह धोकर बैठो मैं अभी गर्मा गरम साग तथा पुड़ियां लेकर आती हुं। कमला ने कहा, कुछ ही देर में खेत से थक हार कर रमेश भी घर आ गया था. कमला ने सभी को खाना खीलाया।
बुढिया ने भी आज छक कर खाना खाया, कमला को ढेरों दुआएं दीं, भगवान सबको ऐसी अन्नपुर्णा बहू दे, जुग जुग जीए, फ़ुले फ़ले ...आदी और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई।
रात दस बजे के करीब अचानक, मौसम ने रुख बदला. ठंडी हवाएं चलने लगीं, जोरदार गर्जना के साथ बिजली चमकने लगी, ठंडी हवाओं ने अब तुफ़ान का रुप ले लिया था और प्रचंड वेग से अपना रौद्र रुप दिखाने लगी। रमेश तथा कमला की नींद भी बदलों की गड़गड़ाहटों से खुल चुकी थी और दोनों खिड़की से झांकने लगे।
मौसम का रुख पल प्रतिपल भयानक हो रहा था, पुरे गांव में जैसे भुचाल आ गया था, तेज हवाएं दरख्तों को उखाड़ अपने साथ लिए जाने पर पर आमादा थीं, बारिश इतनी तेज थी की कुछ ही मिनटों में नदी नाले उफ़नने लगे, और अब कुदरत का कहर बड़े बड़े ओलों के रुप में धरती पर गिरने लगा।
उधर आसमान से ओले गिर रहे थे और इधर कमला की आंखों से जार जार आंसु.....हे भगवान अगर कुछ देर में बारिश नहीं रुकी तो पकी फ़सल खड़े खड़े बर्बाद हो जाएगी...कमला ने कहा, रमेश ने सांत्वना के स्वर में कहा..
अरे क्यों परेशान हो रही है? अभी रुक जाएगा पानी, लेकिन रुह तो अन्दर तक रमेश की भी कांप उठी थी।
बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, लगातार चार घंटे कहर बरपाने के बाद इंद्र देवता शांत हुए. आधी रात को ही कमला रमेश से खेत पर जाने की जिद करने लगी। रमेश ने समझाया, इतनी रात को, ऐसे मौसम में, इस भयावह अंधकार में हम कैसे खेत पर जायेंगे ? अभी सो जा भोर होते ही चलेंगे।
लेकिन नींद तो जैसे दोनों की बैरन बन गई थी, आधी रात आंखों में काटने के बाद सुबह होते ही दोनों खेत की ओर भागे.....भागते भागते दोनों की सांसे फ़ुल गईं थीं, और जैसे ही दोनों खेत पर पहुंचे वहां का नज़ारा देखकर दोनों की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।
चार घंटे लगातार ओले गिरने से पुरी फ़सल चौपट हो चुकी थी, गेहुं की लंबी लंबी बालियां जिन्हें देखकर रमेश का सीना गर्व से दोगुना हो जाता था, आज जमीन चाट रहीं थीं, चने के गुच्छों से लदे पौधे जमीन पर चीत्त पड़े थे. खेतों पर चारों ओर ओलों के रुप में बर्फ़ फ़ैली थी।
कुछ नहीं बचा कमला......सब बर्बाद हो गया। खेतों में बर्फ़ जमी थी. बीज के लिये अनाज भी नहीं बचा.. सारी उम्मीदों, सारे सपनों पर पानी फ़िर गया।
कमला और रमेश दोनों किंकर्तव्यविमुढ से अपनी बर्बाद फ़सल को देख रहे थे, कमला तो स्तब्ध थी लेकिन रमेश को अपनी उजड़ी फ़सल के निचे दबे एक जोड़ी सोने के झुमके दिखाई दे रहे थे...एक ऐसा सपना जो उसकी फ़सल के साथ ही बर्बाद हो गया था।
११ मार्च २०१४
एक मर्मस्पर्शी रचना प्रस्तुत करने के लिए सबसे पहले तो कविता जी आपको बधाई दूंगा।
जवाब देंहटाएंबचपन में पढ़ी कथाकारो की कहानियां याद हो आयी। कुछ एक जगह तो ऐसा लगा कि मुंशी प्रेमचंद की कृति पढ़ रहा हूँ।
बुरा न माने , अभी आपको थोडा सा व्याकरण पर ध्यान देना होगा। कुछ एक स्थानो पर शब्द एवं व्याकरण दोष है।
मै चिन्हित नहीं करना चाहता पर आप स्वयं समझ सकती हैं।
यात्रा वृतांत में सब कुछ चलता है , परन्तु साहित्यिक रचना में ध्यान देना पड़ता है। या यूँ कहे कि अपने आप ध्यान उस तरफ चला जाता है।
एक बार पुन: इस नए प्रयास के लिए बधाई।
रस्तोगी जी,
हटाएंआपके मार्गदर्शन के लिये बहुत बहुत शुक्रिया......मुंशी प्रेमचंद से तुलना....इससे बड़ी प्रशंसा किसी कहानी लेखक के लिए हो ही नहीं सकती. मैं आपसे रिक्वेस्ट करना चाहती हुं की आप व्याकरण की गलतियों तथा अन्य अशुद्धियों को चिन्हित करें क्योंकि स्वयं की गलतियां ढुंढना बड़ा कठीन कार्य है.
एक बार पुन: धन्यवाद.
Great writing. Thanks a lot
जवाब देंहटाएंनहीं - नहीं , यह उचित नहीं, आप जानती हैं कि कुछ समय पहले इस विषय पर संदीप पवांर से विवाद भी हुआ था।
जवाब देंहटाएंमै यह लिखते हुए संकोच भी कर रहा था पर मुझे लगा यह एक अच्छी साहित्यिक रचना है अत: आपका ध्यान इस विषय पर केंद्रित करना चाहता था।
बहुत खूब
जवाब देंहटाएंसचमुच कहानी बहुत ही मर्मस्पर्शी है । किसान जोड़ी की उम्मीदें सपने सब प्रकृति पर निर्भर है उनकी निराशा का हर पहलू उजागर हुआ है इस कहानी में। कविता ,यात्रा वृतांत लिखना और कहानी लिखना दोनों अलग अलग है हम जिस तरह यात्रा का वर्णन्न् लिखते है वो हमारा देखा हुआ और भोगा हुआ होता है पर कहानी हमारे मन की उड़ान होती है कल्पनायें होती है और उन कल्पनाओ को उन भावो को प्रकट करना हर किसी के बस की बात नहीं है।
जवाब देंहटाएंशुरू में त्रुटिया होना कोई नई बात नहीं है । धीरे धीरे सब टीइक़ हो जाता है।
एक बार फिर बधाई कविता