शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अधूरा सुख

भगवान भी कभी कभी कुछ ज्यादा ही कठोरता दिखाते हैं, कहीं बाढ तो कहीं सुखा, किसी की झोली में दुनिया भर की खुशीयां तो कोई दो वक्त की रोटी को मोह्ताज, जिसको बच्चों की कोई चाहत नहीं उसको दर्जन भर बच्चे और किसी को पुरी ज़िन्दगी औलाद के लिये तरसते हुए जीना पड़ता है।

 पड़ोस में रहने वाली सुमन को मैनें हमेशा ही बच्चों के लिये तरसते हुए देखा, आठ वर्ष हो गए थे उसकी शादी को लेकिन अब तक उसे मात्रत्व का सुख प्राप्त नहीं हुआ था, वह सुख जिसके बिना स्त्री कभी अपने आप को संपूर्ण महसूस नहीं कर पाती। लेकिन सुमन की नियति मेरी समझ से कुछ परे थी, अपने बच्चे के लिये दिन रात तरसती सुमन को दुसरों के बच्चे फ़ुटी आंख नहीं सुहाते थे, रंग बिरंगे सुन्दर फ़ुलों की तरह कोलोनी में खेलते कुदते नन्हे मुन्ने बच्चे सुमन को कांटों की तरह चुभते।

एक दिन तो हद हो गई, मेरा दो वर्ष का अबोध बेटा चलते चलते उसके आंगन में सूख रहे धनिया के थाल के नजदीक पहुंच गया और धनिया के थाल के पास बैठ गया और थोड़ा सा धनिया बिखेर दिया, जैसे ही सुमन की नजर बिखरे हुए धनिया और पास ही खेल रहे मेरे बेटे पर पड़ी, उसने अपना आपा खो दिया और गुस्से में तमतमाते हुए जोर जोर से बोलने लगी, पता नहीं कैसे कैसे बच्चे पैदा कर देते हैं और लोगों के आंगन में छोड़ देते हैं। जैसे ही मेरे कानों में उसकी आवाज़ पड़ी मैनें दौड़ कर अपने बच्चे को उठाया और उसे डांटने लगी, अब इतना छोटा बच्चा भला बुरा तो कुछ समझता नहीं था सो मेरी डांट सुनकर रोने लगा।

मैनें पलटकर सुमन को सिर्फ़ इतना ही कहा  "सुमन मैने अपने बच्चे को सिखा कर नही भेजा था की वो तुम्हारा नुकसान करे" इतना सुनते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वो जोर जोर से बड़बड़ाने लगी। मैं पलटकर कहना तो चाहती थी की आपको शायद भगवान इसीलिये बच्चे नहीं देता क्योंकी आपके ह्रदय में ममता नहीं है, पर मैने अपने शब्दों को अपने मन में ही दफ़न कर दिया और यह कह्कर वहां से चल दी की मेरे बच्चे ने आपका जो नुकसान किया है उसकी भरपाई मैं आपको आपका धनिया लौटा कर कर दुंगी। उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हम दोनों में बोलचाल बंद रही, लेकिन जल्द ही मैनें यह सोच कर की बेचारी के साथ भगवान ने अन्याय किया है, और शायद इसीलिये चिड़चिड़ी हो गई है बोलचाल चालु कर दी। मैं भी यह बात जानती थी की उसके मन में भी कोई कपट नहीं है।

सुमन हर समय मेरे सामना अपना दुखड़ा रोती रहती थी, रीना मैं क्या करुं कुछ समझ में नहीं आता कहां जाऊं सब जगह इलाज करवा लिया एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, रुहानी झाड़ फ़ुंक, पूजा पाठ, मान मनौव्वल सब कुछ लेकिन कहीं से उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती। हर महीने सोचती हुं काश इस महिने पीरियड नहीं आये... या फ़िर किसी महिने किसी भी कारण से पीरियड मिस होता है तो मन में आशाओं के ढेरों दिप जगमगा उठते हैं लेकिन ये खुशियां कुछ ही दिनों की मेहमान होती हैं और फिर अगले महीने का इन्तज़ार...बोलते बोलते उसका गला भर आता

मैं उसको समझाती - सुमन कभी कभी कई सालों के बाद भी उपरवाला मेहरबान होता है एक दिन वो तुम्हारी भी सुनेगा, धीरज रखो और भगवान पर विश्वास रखो मैं कभी भीउसके दुख और ईर्ष्या में अन्तर नहीं समझ नहीं पाई, वह नये नये जोड़ों को गोद में बच्चा लिये देखती तो वित्रष्णा से भर उठती, अब इसमें उसका दुख छिपा था या ईर्ष्या या शायद दोनों का मिश्रण ?

एक दिन दोपहर में सुमन बच्चों को जोर जोर से डांट रही थी। बच्चों का जुर्म यह था की वे घर के सामने खाली पड़े मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे, जिसके शोर से उसकी दोपहर की निंद खराब हो गई थी और वो बच्चों को इसका जिम्मेदार ठहरा रही थी।
कई बार इस तरह की घटनाओं से बच्चों के माता पिता को बुरा भी लगता था लेकिन सब उसकी वेदना को समझते थे और चुप रह जाते. सुमन को मैनें बहुत करिब से देखा था, उसका लड़ना झगड़ना, रोना सिसकना सब कुछ मैं समझती थी और इस निष्कर्ष पर पहुंची थी की वो दिल की भली ही थी. दर असल वह अपने दुख से इतनी ज्यादा दुखी थी की कोई उसे लाख चाहकर भी समझ नहीं पाता, हर समय बच्चे की चाहत जो अब तक सनक का रुप ले चुकी थी सुमन के दिलो दिमाग पर हावी रहती।

मैं मौका देखते ही उसके दुख को हल्का करने की गरज से उसे समझाने बैठ जाती "मेरी सलाह मानो तो एक बच्चा गोद ले लो, प्यार से पालने पोसने से तो एक कुत्ते के बच्चे से भी प्यार हो जाता है, पर वह मेरी सलाह पर ज्यादा ध्यान नहीं देती।

एक दिन सुमन छत पर खेल रहे पड़ोस के बच्चों को डांट रही थी - चलो जाओ छत पर दौड़ भाग मत करो अंकल का सर दर्द कर रहा है, मासूम बच्चे डांट सुनकर रुआंसे होकर आपस लौट गये. मैनें सुमन को टोकते हुए मजाक में कहा - सुमन अगर तुम्हें बच्चे होंगे और मस्ती करेंगे तब भैया का सर दर्द होगा तो तुम उन्हें कहां भेजोगी ? उसके पास मेरी बात का कोई जवाब नहीं था लिहाजा वह चुप ही रही।

सास ससुर भी जब कभी सुमन के घर आते तो वे भी हमेशा खुश खबरी सुनने को आतुर रहते थे, पर वे कभी सुमन को कोसते नहीं और न ही उस पर कभी कोई तानाकशी करते, भगवान की मर्जी समझ कर सब मौन रह जाते. उसके पति भी सुलझे हुए तथा समझदार व्यक्ति थे अत: वो भी कभी सुमन पर औलाद के लिये दबाव नहीं डालते थे।

सुमन अक्सर मुझसे कहती:

रीना ..मेरी फ़ैमिली कब कम्पलिट होगी ?

मैं कहती, सुमन ऐसा नहीं है जिनके बच्चे नहीं होते वे भी खुशी से जीवन जीते है।

मेरी बात को अनसुना कर वह अपनी ही रौ में कहे जाती ...हम दोनों का सहारा कौन बनेगा?

कई बार तो मैं मन ही मन झल्ला उठती कि सुमन..क्या बच्चे के अलावा तुम्हारे पास और कोई विषय नहीं है बात करने के लिये? वह मन मसोसकर चुप रह जाती।

एक दिन बड़ी प्रसन्न मुद्रा में चहकती हुई सुमन मेरे घर आई।

रीना ......रीना,  कहां हो, देखो मैं आज तुम्हारे लिये गाजर का हलुआ लाई हुं, तुम्हें बहुत पसंद है ना, कहते हुए उसने मेरे हाथों में गर्मागरम गाजर हलुआ थमा दिया और सोफ़े पर बैठ गई और बच्चा गोद लेने के विषय में बात करने लगी, मुझे बहुत खुशी हुई की चलो देर से ही सही इसे अकल तो आई।

एक दिन कलोनी की कुछ औरतें दबी जुबान में बातें कर रहीं थीं कि मैदान के पिछे वाले नाले के पास एक कपड़े में लिपटा हुआ बच्चा कोई छोड़ गया है, हाय...कैसी बेरहम मां होगी जो अपने फूल से प्यारे नवजात को मरने के लिये छोड़ गई है।

बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर कुछ भले लोगों ने बच्चे को उठा कर पुलिस स्टेशन तक पहुंचा दिया, कुछ दो चार दिन के लिये पुलिस ने थाने में ही बच्चे को सम्हालने की व्यवस्था कर दी, इस आशा में की शायद कोइ परिजन बच्चे को लेने आ जाएं, लेकिन उस अभागे बच्चे को लेने कोइ नहीं आया।

सुमन तथा उसके पति को भी यह बात पता चली तो उन्हें कहीं न कहीं अपना वर्षों का अधुरा सपना पुरा होता हुआ दिखाई दिया। वे दोनों आपसी सहमती से पुलिस थाने गए और सारी जरुरी औपचारिकतायें पुरी करके बच्चे को गोद लेकर घर ले आए, उनके लिये ज्यादा खुशी की बात यह थी की वह बच्चा लड़का था।

सुमन अब बहुत खुश नज़र आती, बच्चे की किलकारियों के साथ मुझे सुमन की भी किलकारियां सुनाई देतीं, लगता था उसका भी बचपन लौट आया था. कभी हर समय दुख के समंदर में डुबी रहने वाली सुमन अब हर समय चहकती रहती। समय अपनी गती से चलता जा रहा था। सुमन ने अपने बच्चे का नाम रखा "निनाद"।

सुमन को बेसब्री से इन्तज़ार था उस लम्हे का जब बच्चा उसे "मां" कह्कर पुकारेगा. वह शब्द जिसे सुनने के लिये सुमन ने आठ साल गम के आंसु पिए थे, उसे उम्मीद थी की जिस दिन "निनाद" उसे मां कहकर पुकारेगा शायद वह दिन वह पल उसके लिये जीवन का सबसे सुखद पल होगा। चारों दिशाओं से उस सुमधुर ध्वनि का निनाद होगा... मां...मां...मां...मां........

लेकिन यह क्या एक साल बीता, दुसरा साल बीता....निनाद तो अपने नाम के सर्वथा विपरीत खमोश ही रहा।

और एक दिन जब उसे डाक्टर के पास चेक अप के लिये ले जाया गया, तो डाक्टर ने खुलासा किया की बच्चा गुंगा है और कभी बोल नहीं पाएगा. सुमन के उपर ऐसा वज्रपात हुआ की वह आंखें फ़ाड़ फ़ाड़ कर पत्थर की मुरत बनकर डाक्टर साहब को देखती रही।

सुमन अब अपने आप को ठगा सा मह्सुस कर रही थी, न कुछ बोली और न ही रोई, निनाद को गोद में उठाकर अपनी राह चल पडी।

शायद विधाता ने उसकी किस्मत में यही लिखा था......अधुरा सुख।
    

12 टिप्‍पणियां:

  1. कविता जी,
    बहुत ही सुंदर तथा दिल को छु लेने वाली कहानी. एसे ही लिखते रहिये.

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  2. Kavita Ji,

    Mujhe pahli baar aaj pata chala ki aap sundar yatra vritant hi nahin, achchi achchi kahaniya bhi likhtee hain. Adhoora Sukh achchi lagi, badhai. Likhti rahiye, share karti rahiye. :)

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    1. सुशांत जी,
      कहानी पढने, टिप्पणी करने तथा उत्साहवर्धन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद.
      धन्यवाद.

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  3. कविता जी कहानी लेखन के लिए बधाई, साहित्य में आपका अच्छा रुझान है आपके लिए कुछ सुझाव है यदि आप चाहे तो ़,,,,,,,,,, शेष

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  4. भाभी जी,
    सबसे पहले आपके मेरे ब्लोग पर आने, कहानी पढने तथा कमेंट करने के लिये धन्यवाद. आपके सुझाव एवं समिक्षाओं का हमेशा स्वागत है.

    धन्यवाद.

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  5. Bhabhiji ,

    Kahani bahut achchi lagi , Suman ko suman ke kilane ka intjar tha , suman khila bhi lekin khushubu ke bina .

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    1. kahani padhne ke liya aapka bahut Dhanyawaad.Blog padhte rahiya aur aise hi margdarshan karte rahiye.

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  6. कविता जी एक माँ के और वो भी उस माँ के मर्म को जो की दुःख से तड़प रही है आपने जीवंत कर दिया है मैंने तो सोचा ही नहीं था की आप ऐसी मार्मिक और वेदना से भरी कहानी भी लिख सकती हैं

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  7. लीजिये एक सुझाव देने वाला और आ गया :)

    बहुत सुंदर लेखन ।

    टंकण से हो रही अशुद्धियों को शुद्ध करने की कोशिश करें ।

    कुछ बता रहा हूँ जैसे कमप्लीट, गूँग़ा, महसूस, अधूरा,समीक्षा आदि आदि होना चाहिये । वर्तनी से मतलब है । लिखते रहिये । शुभकामनाऐं ।

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  8. कविता जी आपकी कहानी एकदम दिल को छुने वाली है।

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