मुसलाधार बारिश के साथ हवा, आंधी चल रही थी और जोर की आवाज़ों के साथ बिजली गरज रही थी. बाहर ऎसा तुफ़ान मच रहा था जैसॆ प्रलय आने को है. मुनिया अपने पति के इन्तज़ार में थी, उसने खाना बना कर रखा था.
एक डेढ घंटे के बाद बारिश थमी, पैरों की आहट से मुनिया समझ गई की उसका पति रमेश आ चुका है. दरवाजे की कुंडी की लगातार खड़खड़ाहट सुनकर मुनिया दरवाजे की ओर दौड़ी, दरवाजा खुलते ही दारु की जबर्दस्त बदबु भी उसके साथ अन्दर आई, लड़खड़ाते कदमों से जैसे अपने शरीर को घसीटता हुआ वह अंदर आया.
मुनिया ने दबी आवाज़ में पुछा - खाना ले आउं ?
क्या बनाया है आज खाने में ? रमेश ने रौबदार आवाज़ में पुछा.
भिंडी की सब्जी है. मुनिया मिमियाते हुए बोली.
स्साली.....अब यह घास फ़ूस ही बचा है मेरे खाने को? भिंडी तु खा और मेरे लिये ये बना. कह्ते हुए उसने मुनिया की ओर मांस की थैली उछाल दी.
मुनिया रमेश के सख्त स्वभाव को भलीभांति जानती थी अत: चुपचाप मांस पकाने बैठ गई. जरा मसालेदार और चटपटा बनाना.......रमेश ने कहा.
रमेश सिर्फ़ नाम का ही नहीं काम का भी जल्लाद था, वही जल्लाद जो जेलों में सजायाफ़्ता कैदियॊं को मौत देने का काम करते है. जितना वह शरीर से काला, लंबा चौड़ा और कुरुप था उससे कहीं ज्यादा ह्रदय से कठोर था, उसके लिये कोई भी रिश्ता नाता कुछ मायने नहीं रखता था. प्यार, प्रेम, दया, ममता, जैसी भावनायें भगवान उसमें डालना ही भुल गया था.
खाना खाने के बाद अपनी चारपाई पर सोने पहुंचा पर अपनी बुढी मां की लगातार चलती खांसी से बार बार उसकी निंद उचट रही थी. गुस्से में बकने लगा - इतना खांसती है बुढीया की न तो सोते बनता है न जागते, जी करता है इसका टेंटुआ दबा दुं.....हमेशा की झंझट खतम. मुनिया ने डरी डरी अवाज में बोला, अब बेचारी कहां जाकर खांसेगी.
रमेश जल्लाद का मन न जाने कब का मर चुका था, या शायद कभी जन्मा ही नहीं था. उसका पांच वर्ष का एक बेटा छोटु था जिसे वह कभी अपने पास नहीं फ़टकने देता था, न ही कभी उसके सर पर हाथ फ़ेरता था.
मां, बाबा ऐसे क्यों हैं? छोटु ने अपनी मां से पुछा.
कुछ नहीं बेटा, वे तो अच्छे हैं, लेकिन जल्लाद का काम करते करते ऐसे हो गए हैं. मुनिया ने जवाब दिया.
मां ये जल्लाद क्या होता है? छोटु ने उलटे प्रश्न पुछा तो पीछा छुड़ाने के लिये मुनिया ने कहा बाद में बताउंगी.

बचपन में रमेश भी और बच्चों की ही तरह था लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता गया अपने बाप दादाओं की तरह गुणों तथा कर्म से भी जल्लाद बनता गया. उसके बाप दादा सरकारी जल्लाद थे तथा गंभीर अपराधियों को फ़ांसी देने का काम करते थे.
रमेश ने बड़ी खुशी तथा गर्व से अपने बाप के काम को अपनाया तथा खानदान की परंपरा को आगे बढाया. उसकी जींदगी की पहली फ़ांसी के समय भी उसका सीना तना रहा, न डर न घबराहट न दया, पूरी तरह बेखौफ़ रहा वह. अपने हाथों से उसने रस्सी का फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े से बने थैलीनुमा आवरण से कैदी का चेहरा ढंका, लीवर खींचा और खटाक की आवाज़ के साथ कु्छ ही पलों में कैदी फ़ंदे पर झुल रहा था.
इस काम के एवज में उसे कुछ रुपये मिले और अपनी इसी पहली कमाई से उसने पहली बार दारु को भी गले लगा लिया और तब से इन दोनों का चोली दामन का साथ है.
एक दिन छोटु की तबीयत खराब हुई और ऐसी हुई की कई दिनों के उपचार के बाद भी सम्हलने का नाम नहीं ले रही थी. उल्टी दस्त की वजह से वह बेहद कमजोर हो गया था, कई तरह के उपचार कराए गए लेकिन न तो दवा से और न ही दुआ से कोई फ़ायदा हो रहा था. इसी इलाज की भाग दौड़ तथा दिन प्रतिदीन बिगड़ती जा रही छोटु की हालत ने कब रमेश के पाषाण ह्रदय में भावनाओं के बीज अंकुरित कर दिये रमेश को खुद पता नहीं चला, आखिर को था तो उसकी ही औलाद, उसका अपना खुन, अपना अंश.
लेकिन भगवान को तो कुछ और ही मंजुर था, एक रात छोटु को बहुत तेज ज्वर आया, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और शरीर बुरी तरह तप रहा था, मुनिया तथा रमेश उसे लेकर अस्पताल की तरफ़ दौड़े, बेहोशी की सी हालत में वह बुदबुदा रहा था बाबा...मैं कब ठीक होउंगा, मैं कब खेलने लगुंगा.....बोलते बोलते उस पर मुर्छा छाने लगी और फिर कुछ ही देर में उसने रमेश की गोद में ही दम तोड़ दिया.
जिंदगी में पहली बार रमेश की आंखों से आंसू टपक पड़े, उसका कठोर ह्रदय मोम की तरह पिघल गया. जिन हाथों से वह लोगों के गले में फ़ांसी का फ़ंदा डाला करता था आज उन्हीं हाथों में उसके इकलौते बेटे की लाश थी. कहते हैं जल्लादों के घरों में बच्चे ज्यादा नहीं जी पाते हैं. आज पहली बार रमेश को एह्सास हुआ की किसी की जान की कीमत क्या होती है?
समय का पहिया अपनी गती से चल रहा था, करीब दो वर्ष के बाद उसके यहां एक और बेटे का जन्म हुआ और इस बार उसे बाप बनने की खुशी हुई. अब वह अपने परिवार से प्यार करने लगा. मुनिया तथा रमेश की बुढी मां दोनों को रमेश का बदला रुप अच्छा लगने लगा. इधर कई सालों से रमेश ने जल्लाद का काम नहीं किया.
कुछ समय के बाद ही एक दुष्कर्म एवं हत्या के आरोपी को फ़ांसी की सजा मुकर्रर हुई और तारिख भी निश्चित हो गई, तारिख वही तय हुई जिस दिन उसके बेटे का जन्मदिन था. फ़ांसी की एक रात पहले रमेश को निंद नहीं आई और वह पुरी रात करवटें बदलता रहा. उसके मन में यह बात घर कर गई की फ़ांसी देने से ईश्वर का प्रकोप उस पर फ़ुटता है और और इसकी सजा उसकी संतान को मिलती है. वह इस सजा को ईश्वर का न्याय समझता था, पर क्या करता काम तो काम होता है चाहे जैसा भी हो, फ़िर कभी उसे यह भी लगता की इन्सान का कर्म ही उसकी पूजा होती है, ईश्वर ने उसके खानदान को रोजी रोटी के रूप में यही कर्तव्य सौंपा है तो इसमें उसकी क्या गलती है ? इसी उधेड़बुन में रात निकल गई.
सुबह होते ही वह उठा और मुनिया से बोला - मैं जेल जा रहा हुं, बच्चे का खयाल रखना, यह कहते हुए उसका गला भर आया. उसके आंसु मुनिया से भी छुपे नहीं रह पाए, वह भर्राये गले से बोला - हे भगवान तुने मुझे ऐसा काम क्यों दिया है?
मुनिया समझाते हुए बोली - काम काम होता है, तुम उस कैदी से अपनी कोई निजी दुश्मनी थोड़े ही निकाल रहे हो, तुम न करोगे तो कोई और करेगा और बुरे कर्म का फ़ल भी तो मिलना चहीए ना.
अपने नन्हे से बच्चे को जन्मदिन का आशिर्वाद देते हुए उसने रुंधे गले से जीते रहो कहा और तेज कदमों से घर से बाहर निकल गया. आज पहली बार उसका दिल जोरों से धड़क रहा था और हाथ कांप रहे थे.
रास्ते में उसने एक एक अद्दी दारु पी ताकी उसका आत्मविश्वास न डगमगाये. जेल जाकर वह अपने काम में लग गया. कांपते हाथों से फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े का आवरण तैयार किया और अपने सारे सामान के साथ जेल सुपरींटेंडेंट तथा अन्य अधिकारियों की उपस्थिती में फ़ांसी के लिये तैयार चबुतरे पर जा खड़ा हुआ जहां कैदी भी खड़ा था, लेकिन आज उसके होश उड़े हुए थे, जीन हाथों में फ़ंदा थामे था वे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे, कभी इन्हीं हाथों से अनगिनत बार वह मुजरिमों को फ़ांसी चढा चुका था, आज वही हाथ उसे चिढा रहे थे. शराब का सारा नशा उड़नछू हो चुका था.
जैसे ही उसकी नज़रें मुजरिम की आंखों से टकराईं तो किसी अन्जाने भय से निचे झुक गईं. रमेश सोचने लगा अपराध तो आवेश में आकर हो जाते हैं कोई जानबुझ कर अपने आप को ताउम्र सलाखों के पिछे सड़ने देना या फ़िर फ़ांसी के फ़ंदे पर झुलना नहीं चाहता, और फिर सुधार की गुंजाईश तो हर किसी में होती है. वह स्वयं एक पत्थर दिल इन्सान था लेकिन आखिर औलाद के प्रेम ने उसका भी तो ह्रदय परिवर्तन किया, और फ़िर अगर किसी की जान जानी भी है तो उसकी मौत का जिम्मेदार मैं क्यों बनुं? यह सोचते सोचते अनयास ही उसके हाथ का फ़ंदा निचे गिर गया, उसने फ़ंदे को उठाया और यंत्रचलित सा कैदी की ओर बढा, उसे काला कापड़ा पहनाया, और लीवर पर हाथ रखा.......लीवर दबाने के लिए उसने अपने शरीर की सारी शक्ती, सारी उर्जा इकट्ठी की लेकिन वह लीवर जिसे आज से पहले वह एक उंगली के इशारे से दबा दिया करता था आज उससे नहीं दब पाया.
वह दौड़ा और जेल अधिक्षक के पैरों में गिर कर रोते हुए कहने लगा - साहब आज और आज के बाद मुझसे यह काम नहीं होगा, मैं कड़ी मेहनत करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल लुंगा साहब लेकिन आज के बाद यह काम नहीं करुंगा......कहते हुए तथा रोते सिसकते हुए वह विपरीत दिशा की ओर बढ चला.....एक नई जिंदगी की शुरुआत करने.
एक डेढ घंटे के बाद बारिश थमी, पैरों की आहट से मुनिया समझ गई की उसका पति रमेश आ चुका है. दरवाजे की कुंडी की लगातार खड़खड़ाहट सुनकर मुनिया दरवाजे की ओर दौड़ी, दरवाजा खुलते ही दारु की जबर्दस्त बदबु भी उसके साथ अन्दर आई, लड़खड़ाते कदमों से जैसे अपने शरीर को घसीटता हुआ वह अंदर आया.
मुनिया ने दबी आवाज़ में पुछा - खाना ले आउं ?
क्या बनाया है आज खाने में ? रमेश ने रौबदार आवाज़ में पुछा.
भिंडी की सब्जी है. मुनिया मिमियाते हुए बोली.
स्साली.....अब यह घास फ़ूस ही बचा है मेरे खाने को? भिंडी तु खा और मेरे लिये ये बना. कह्ते हुए उसने मुनिया की ओर मांस की थैली उछाल दी.
मुनिया रमेश के सख्त स्वभाव को भलीभांति जानती थी अत: चुपचाप मांस पकाने बैठ गई. जरा मसालेदार और चटपटा बनाना.......रमेश ने कहा.
रमेश सिर्फ़ नाम का ही नहीं काम का भी जल्लाद था, वही जल्लाद जो जेलों में सजायाफ़्ता कैदियॊं को मौत देने का काम करते है. जितना वह शरीर से काला, लंबा चौड़ा और कुरुप था उससे कहीं ज्यादा ह्रदय से कठोर था, उसके लिये कोई भी रिश्ता नाता कुछ मायने नहीं रखता था. प्यार, प्रेम, दया, ममता, जैसी भावनायें भगवान उसमें डालना ही भुल गया था.
खाना खाने के बाद अपनी चारपाई पर सोने पहुंचा पर अपनी बुढी मां की लगातार चलती खांसी से बार बार उसकी निंद उचट रही थी. गुस्से में बकने लगा - इतना खांसती है बुढीया की न तो सोते बनता है न जागते, जी करता है इसका टेंटुआ दबा दुं.....हमेशा की झंझट खतम. मुनिया ने डरी डरी अवाज में बोला, अब बेचारी कहां जाकर खांसेगी.
रमेश जल्लाद का मन न जाने कब का मर चुका था, या शायद कभी जन्मा ही नहीं था. उसका पांच वर्ष का एक बेटा छोटु था जिसे वह कभी अपने पास नहीं फ़टकने देता था, न ही कभी उसके सर पर हाथ फ़ेरता था.
मां, बाबा ऐसे क्यों हैं? छोटु ने अपनी मां से पुछा.
कुछ नहीं बेटा, वे तो अच्छे हैं, लेकिन जल्लाद का काम करते करते ऐसे हो गए हैं. मुनिया ने जवाब दिया.
मां ये जल्लाद क्या होता है? छोटु ने उलटे प्रश्न पुछा तो पीछा छुड़ाने के लिये मुनिया ने कहा बाद में बताउंगी.

बचपन में रमेश भी और बच्चों की ही तरह था लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता गया अपने बाप दादाओं की तरह गुणों तथा कर्म से भी जल्लाद बनता गया. उसके बाप दादा सरकारी जल्लाद थे तथा गंभीर अपराधियों को फ़ांसी देने का काम करते थे.
रमेश ने बड़ी खुशी तथा गर्व से अपने बाप के काम को अपनाया तथा खानदान की परंपरा को आगे बढाया. उसकी जींदगी की पहली फ़ांसी के समय भी उसका सीना तना रहा, न डर न घबराहट न दया, पूरी तरह बेखौफ़ रहा वह. अपने हाथों से उसने रस्सी का फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े से बने थैलीनुमा आवरण से कैदी का चेहरा ढंका, लीवर खींचा और खटाक की आवाज़ के साथ कु्छ ही पलों में कैदी फ़ंदे पर झुल रहा था.
इस काम के एवज में उसे कुछ रुपये मिले और अपनी इसी पहली कमाई से उसने पहली बार दारु को भी गले लगा लिया और तब से इन दोनों का चोली दामन का साथ है.
एक दिन छोटु की तबीयत खराब हुई और ऐसी हुई की कई दिनों के उपचार के बाद भी सम्हलने का नाम नहीं ले रही थी. उल्टी दस्त की वजह से वह बेहद कमजोर हो गया था, कई तरह के उपचार कराए गए लेकिन न तो दवा से और न ही दुआ से कोई फ़ायदा हो रहा था. इसी इलाज की भाग दौड़ तथा दिन प्रतिदीन बिगड़ती जा रही छोटु की हालत ने कब रमेश के पाषाण ह्रदय में भावनाओं के बीज अंकुरित कर दिये रमेश को खुद पता नहीं चला, आखिर को था तो उसकी ही औलाद, उसका अपना खुन, अपना अंश.
लेकिन भगवान को तो कुछ और ही मंजुर था, एक रात छोटु को बहुत तेज ज्वर आया, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और शरीर बुरी तरह तप रहा था, मुनिया तथा रमेश उसे लेकर अस्पताल की तरफ़ दौड़े, बेहोशी की सी हालत में वह बुदबुदा रहा था बाबा...मैं कब ठीक होउंगा, मैं कब खेलने लगुंगा.....बोलते बोलते उस पर मुर्छा छाने लगी और फिर कुछ ही देर में उसने रमेश की गोद में ही दम तोड़ दिया.
जिंदगी में पहली बार रमेश की आंखों से आंसू टपक पड़े, उसका कठोर ह्रदय मोम की तरह पिघल गया. जिन हाथों से वह लोगों के गले में फ़ांसी का फ़ंदा डाला करता था आज उन्हीं हाथों में उसके इकलौते बेटे की लाश थी. कहते हैं जल्लादों के घरों में बच्चे ज्यादा नहीं जी पाते हैं. आज पहली बार रमेश को एह्सास हुआ की किसी की जान की कीमत क्या होती है?
समय का पहिया अपनी गती से चल रहा था, करीब दो वर्ष के बाद उसके यहां एक और बेटे का जन्म हुआ और इस बार उसे बाप बनने की खुशी हुई. अब वह अपने परिवार से प्यार करने लगा. मुनिया तथा रमेश की बुढी मां दोनों को रमेश का बदला रुप अच्छा लगने लगा. इधर कई सालों से रमेश ने जल्लाद का काम नहीं किया.
कुछ समय के बाद ही एक दुष्कर्म एवं हत्या के आरोपी को फ़ांसी की सजा मुकर्रर हुई और तारिख भी निश्चित हो गई, तारिख वही तय हुई जिस दिन उसके बेटे का जन्मदिन था. फ़ांसी की एक रात पहले रमेश को निंद नहीं आई और वह पुरी रात करवटें बदलता रहा. उसके मन में यह बात घर कर गई की फ़ांसी देने से ईश्वर का प्रकोप उस पर फ़ुटता है और और इसकी सजा उसकी संतान को मिलती है. वह इस सजा को ईश्वर का न्याय समझता था, पर क्या करता काम तो काम होता है चाहे जैसा भी हो, फ़िर कभी उसे यह भी लगता की इन्सान का कर्म ही उसकी पूजा होती है, ईश्वर ने उसके खानदान को रोजी रोटी के रूप में यही कर्तव्य सौंपा है तो इसमें उसकी क्या गलती है ? इसी उधेड़बुन में रात निकल गई.
सुबह होते ही वह उठा और मुनिया से बोला - मैं जेल जा रहा हुं, बच्चे का खयाल रखना, यह कहते हुए उसका गला भर आया. उसके आंसु मुनिया से भी छुपे नहीं रह पाए, वह भर्राये गले से बोला - हे भगवान तुने मुझे ऐसा काम क्यों दिया है?
मुनिया समझाते हुए बोली - काम काम होता है, तुम उस कैदी से अपनी कोई निजी दुश्मनी थोड़े ही निकाल रहे हो, तुम न करोगे तो कोई और करेगा और बुरे कर्म का फ़ल भी तो मिलना चहीए ना.
अपने नन्हे से बच्चे को जन्मदिन का आशिर्वाद देते हुए उसने रुंधे गले से जीते रहो कहा और तेज कदमों से घर से बाहर निकल गया. आज पहली बार उसका दिल जोरों से धड़क रहा था और हाथ कांप रहे थे.
रास्ते में उसने एक एक अद्दी दारु पी ताकी उसका आत्मविश्वास न डगमगाये. जेल जाकर वह अपने काम में लग गया. कांपते हाथों से फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े का आवरण तैयार किया और अपने सारे सामान के साथ जेल सुपरींटेंडेंट तथा अन्य अधिकारियों की उपस्थिती में फ़ांसी के लिये तैयार चबुतरे पर जा खड़ा हुआ जहां कैदी भी खड़ा था, लेकिन आज उसके होश उड़े हुए थे, जीन हाथों में फ़ंदा थामे था वे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे, कभी इन्हीं हाथों से अनगिनत बार वह मुजरिमों को फ़ांसी चढा चुका था, आज वही हाथ उसे चिढा रहे थे. शराब का सारा नशा उड़नछू हो चुका था.
जैसे ही उसकी नज़रें मुजरिम की आंखों से टकराईं तो किसी अन्जाने भय से निचे झुक गईं. रमेश सोचने लगा अपराध तो आवेश में आकर हो जाते हैं कोई जानबुझ कर अपने आप को ताउम्र सलाखों के पिछे सड़ने देना या फ़िर फ़ांसी के फ़ंदे पर झुलना नहीं चाहता, और फिर सुधार की गुंजाईश तो हर किसी में होती है. वह स्वयं एक पत्थर दिल इन्सान था लेकिन आखिर औलाद के प्रेम ने उसका भी तो ह्रदय परिवर्तन किया, और फ़िर अगर किसी की जान जानी भी है तो उसकी मौत का जिम्मेदार मैं क्यों बनुं? यह सोचते सोचते अनयास ही उसके हाथ का फ़ंदा निचे गिर गया, उसने फ़ंदे को उठाया और यंत्रचलित सा कैदी की ओर बढा, उसे काला कापड़ा पहनाया, और लीवर पर हाथ रखा.......लीवर दबाने के लिए उसने अपने शरीर की सारी शक्ती, सारी उर्जा इकट्ठी की लेकिन वह लीवर जिसे आज से पहले वह एक उंगली के इशारे से दबा दिया करता था आज उससे नहीं दब पाया.
वह दौड़ा और जेल अधिक्षक के पैरों में गिर कर रोते हुए कहने लगा - साहब आज और आज के बाद मुझसे यह काम नहीं होगा, मैं कड़ी मेहनत करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल लुंगा साहब लेकिन आज के बाद यह काम नहीं करुंगा......कहते हुए तथा रोते सिसकते हुए वह विपरीत दिशा की ओर बढ चला.....एक नई जिंदगी की शुरुआत करने.
