मंगलवार, 11 मार्च 2014

मौसम


कमला आज बहुत ही खुश थी क्योंकि उसके पति रमेश ने आज अपने परिवार को राम लीला देखने ले जाने के लिये का वादा किया था। गांवों में मनोरंजन के साधन यही तो होते हैं रेडियो, नौटंकी या राम लीला। पास ही के गांव नेकपुर में मां दुर्गा का मेला लगा था, यह मेला मेला न होकर गांव वालों के लिये बहुत बड़ा उत्सव होता था दूर दूर के गांवों से ग्रामिण इस मेले का आनंद उठाने के लिये बैल गाड़ीयों में ठसा ठस भर कर कई किलोमिटर का सफ़र तय करके नेकपुर आते थे, क्या कुछ नहीं होता था नेकपुर के इस मेले में, छोटे बड़े तरह तरह के झुले, जादु का खेला, रंग बिरंगे मिट्टी के खिलौनों की कतारबद्ध दुकानें, बड़े बड़े तंबुओं से घीरे चलित सिनेमाघर, जलपान ग्रह से उठती गुड़ की जलेबियों की मदमस्त कर देने वाली खुश्बू, मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर फ़टफ़टी चलाते नौजवान, नौटंकी के टेंट से सटे लकड़ी के चबुतरे पर अपनी विचित्र भाव भंगिमाओं से दर्शकों को आकर्षित एवं आमंत्रित करतीं नर्तकियां........


कमला ने जल्दी जल्दी गाय का दुध दुह लिया. शाम का खाना बनाने बैठी तो खुशी के मारे उसके शरीर में कंपकंपी हो रही थी और उसकी रोटियां मन चाहे आकार ले रहीं थीं। इस संसार में हर व्यक्ति के लिये खुशी के मायने तथा परिभाषाएं अलग अलग होतीं हैं, सारा दिन खेतों में काम करने, गाय भैंसों की सेवा तथा घर के चुल्हे चौके में रमी रहने वाली कमला के लिये मेले में घुमने का प्रलोभन किसी दिवास्वप्न से कम न था।  

अपनी बुढी सास के लिये शकरकंद उबालकर अब कमला चुल्हे पर दलिया चढाने की तैयारी कर रही थी। बुढिया के दांत तो सालों पहले इस नश्वर संसार को अलविदा कह चुके थे लेकिन जिव्हा उसकी बढती उम्र के साथ साथ यौवन के नए पायदान चढ रही थी, अत: कमला को घर गिरस्ती के अन्य कामों के अलावा अपनी स्वादु सांस की जिव्हा का भी पुरा खयाल रखना होता था, क्योंकि बुढिया घर पर ही रुकने वाली थी।

शाम हो चुकी थी और अब रमेश भी खेत से आ चुका था, रमेश तथा अपनी बारह साल की बेटी मुनिया को खाना परोस कर कमला भी वहीं चुल्हे के पास बैठ गई। मुनिया को मेले में जाने की खुशी में भात का स्वाद भी अच्छा नहीं लग रहा था, खाते खाते पुछने लगी -

मां राम लीला देखने कब जायेंगे?

पहले अच्छे से खाना खा लो फिर चलेंगे, कमला ने कहा।

कमला ने अपनी लाल रंग की चमकीली साड़ी निकाली और पहनकर आंखों में काजल लगाया, माथे पर चटख लाल रंग की बिंदी लगाई, लाल रंग की चुड़ीयां पहनीं और इस तरह कमला का श्रंगार पुरा हुआ, कई महीनों के बाद  शायद आज तैयार हुई थी, एक भरपुर नज़र आइने पर डाली, अपने आप को निहारा और इठलाती हुई रमेश के सामने आई।

रमेश तो उसे देखता ही रह गया, जैसे पलक झपकाना ही भुल गया हो। उसे आज अपने आप पर गर्व मह्सुस हो रहा था. उसकी स्थिती उस कस्तुरी म्रग की तरह थी जिसकी नाभी में कस्तुरी छुपी होती है और वह उसे ढुंढने में पुरी जिंदगी लगा देता है।

अरे कमला आज तो तु बड़ी रूपवती लग रही है रे, रमेश ने छेड़नेवाले अंदाज़ में कहा।

मज़ाक मत करो....शर्माते हुए कमला ने कहा।

अरे नहीं रे, सच कह रहा हुं बड़ी सुंदर लग रही है।

धत्त....कमला ने शर्म से सर झुका लिया।

कमला, इस बार अच्छी फ़सल होगी ना तो तुझे सोने की झुमकीयां बनवा दुंगा.....रमेश ने कहा।

इतना सुनते ही कमला और भी प्रसन्न होकर चिड़ीयां की तरह फ़ुदकने लगी।

नौ बरस का छोटा मोहन भी मेला जाने के लिए मचल रहा था। दोनॊं बच्चों को तैयार करके अब कमला तथा रमेश अपनी बैल गाड़ी में जरुरत का समान रख रहे थे। पास पड़ोस के और भी परिवार मेला देखने जाने के लिये तैयार खड़े थे। शाम सात बजे तक सभी अपनी अपनी बैल गाड़ी में अपने परिवार के साथ सवार होकर नेकपुर की ओर चल दिये. अंधेरा हो चला था, गांव की गलियों से गुजरते हुए बैलगाड़ीयों का यह काफ़िला अब सुनसान पगडंडी पर आगे बढ रहा था. रात के सन्नाटे में बैलों के गले में बंधी घंटीयां कर्णप्रिय स्वरलहरियां छेड़ रही थीं।

ठीक समय पर काफ़िले ने नेकपुर की सीमा में प्रवेश किया, दुर से ही दिखाई देती मेले की तेज  लाईटें और लाउड स्पीकरों का शोर सभी के मन में रोमांच पैदा कर रहा था, खास कर बच्चे तो ऐसे अधीर हुए जा रहे थे जैसे कुछ ही देर में वे नहीं पहुंचे तो सब कुछ खतम हो जाएगा, मेले का शोर सुनकर बैलों में भी एक नई स्फ़ुर्ती भर गई थी और अब वे भी जल्द से जल्द मेले में पहुंच जाना चाहते थे, और कुछ ही देर में वे सब मेले में थे।

मेले के बाहरी मैदान में बैलों तथा गाड़ीयों को बांधकर जब कमला, रमेश, मुनिया तथा मोहन मेले में घुसे तो सबके मन में एक अलग ही उत्साह व्याप्त था। बच्चों ने जीभर के झुले झुले, जलेबियां खाई, मौत का कुआं देखा, कमला ने अपने लिये कुछ साज श्रंगार का समान खरीदा तो बच्चों के लिये खेल खिलौने और जब इन सब क्रिया कलापों और वस्तुओं से मन भर गया तो सब राम लीला मैदान में अपने साथ लाये चादर बिछाकर राम लीला देखने बैठ गए और राम लीला का आनंद लेने लगे।

वापसी में दोनो बच्चे बैलगाड़ी में सो चुके थे, रात्री का दुसरा प्रहर था, अम्मा बाहर बरमदे में चार पाई पर बैठी थी, पास में एक डंडा था और चारपाई से सटकर रमेश का वफ़ादार कुकुर शेरू सो रहा था।

अम्मा तु सोई नहीं ? रमेश ने पुछा ?

नहीं बेटा, अब इस बुढापे में नींद कहां आती है, और फिर तुम लोग जब तक सकुशल घर नहीं पहुंचते मुझे नींद कैसे आ सकती थी भला, अब सोने की कोशिश करती हुं और बुढीय़ा सोने का उपक्रम करने लगी।

भोर होते ही कमला जाग उठी, रात नींद पुरी नहीं होने तथा सफ़र की थकान की वजह से उसका अंग अंग दुख रहा था लेकीन उस बेचारी की किस्मत में आराम कहां? रात जल्दी सोए या देर से सुबह उठकर घर के काम काज तो उसी को निबटाने होते थे।

रमेश भी अब नहा धोकर खेत पर जाने की तैयारी करने लगा।

सुनो जी, तनिक तिवारी पंडित जी से मिलते चले जाना, पुछना अब के बरस फ़सल कैसी होगी? कमला तु भी पुरी बावरी है री, अब फ़सल के आने में भला पंडित क्या करेगा ये सब तो भगवान के हाथों में होता है, और तु भली भांती जानती है कि तिवारी पंडित की भविष्यवाणी कितनी सच होती है। खैर, कमला की जिद के आगे घुटने टेकते हुए रमेश ने कहा ठीक है पूछ लुंगा.....

कमला ने दोनों बच्चों को तैयार करके गांव की प्राथमिक शाला में पढने के लिये रवाना किया और खुद अपने कामों में लग गई. रमेश भी खेत की ओर चल दिया। कमला ने गोबर निकाला, गाय का दुध निकाला, अम्मा को चाय बना कर दी, खाना तैयार किया और पोटली में खाना बांधकर खेत की ओर चल पड़ी. सारा दिन घर के कामों में खटर-पटर करती रहती कमला के पास इतना भी वक्त नहीं था की दो घड़ी अपने आपको आइने के सामने निहार ले।

दोनों पति पत्नि खून पसीना एक करके अपने खेत को सींचते, पुरी लगन एवं मेहनत से एक एक पौधे को निखरते क्योंकि यही फ़सल, यही पौधे तो इन खेतिहर ग्रामिणों की खुशियों के हरकारे होते हैं, फ़सल अच्छी आ गई तो वारे न्यारे और बिगड़ गई तो फ़ाके......

अपनी लहलहाती फ़सल को देखकर दोनों गर्व मिश्रित खुशी से फ़ुले नहीं समा रहे थे। कमला इस बार गेहुं चने की फ़सल जोरदार हुई है, और हां वो तेरे तिवारी पंडित जी ने भी तो कहा है की इस बार हमारी फ़सल खुब लाभ देकर जाएगी...  रमेश ने कहा. शायद इस बार भगवान जी हम पर पुरी तरह मेहरबान हैं.......चरों ओर खुशियां बिखर रहीं थीं।

कमला ने पोटली से खाना निकाला। बेसन, मक्का की रोटी और मिर्ची का अचार.....दोनों ने साथ बैठकर प्रेम से खाना खाया और कुछ देर सुस्ताने की गरज से वहीं कुएं के पास पेड़ की छाया में दोनों लेट गए...

आसमान की ओर ताकते हुए रमेश बोला....

कमला, तु मेरा कितना खयाल रखती है रे.....मैं तो धन्य हो गया तेरे जैसी जोरु पाकर, न जाने कौन से पुण्य किये थे मैने पिछले जनम में जो तु मुझे मिली।

मुनिया के बापु, क्यों मुझे पाप में धकेल रहे हो इतनी तारिफ़ करके, आप भी तो मेरा कितना खयाल रखते हो....मैं भी बहुत खुश हुं, भगवान ने मुझे देवता जैसा पति दिया, प्यारे प्यारे बच्चे दिये और एक औरत को क्या चाहिये ? 

नहीं कमला तु दिन रात घर के कामों में घिसती रहती है, और मैं तो तुझे इतने सालों में एक जोड़ी झुमके भी नहीं दिला सका, लेकिन देखना अबके बरस फ़सल के बाद तुझे शहर ले जाकर तेरी पसन्द के सोने के झुमके दिलवाउंगा।

कमला मंद मंद मुस्कुराते हुए आसमान की ओर अपलक ताक रही थी, नए झुमके पहनने का खयाल ही उसे रोमांचित कर देने के लिया पर्याप्त था, कमला की तंद्रा तब टुटी जब रमेश ने प्रेमातिरेक में उसे अपने मजबूत बाहुपाश में कैद कर लिया.......अरे हटिये ये क्या कर रहे हैं आप किसी ने देख लिया तो? और झटके से खड़ी हो कर घर जाने की तैयारी करने लगी।

कमला की आहट पाते ही अम्मा ने हांक लगाई,  बहू....बहू, कहां हो ? कमला दौड़ती दौड़ती अम्मा की चारपाई के नजदिक पहुंची....हां अम्मा क्या हुआ?

अरी कुछ नहीं बहू, बहुत दिनों से हलवा नहीं खाया, बहुत मन कर रहा था, सो तेरे आने की ही बाट जोह रही थी, और हां बहु नरम नरम पुड़ीयां भी बना लेना.....ये मरी जीभ भी बहुत तंग करने लगी है, कुछ न कुछ खाने का मन करता रहता है।  

ठीक है अम्मा शाम को बना लुंगी, घर में भगवान की किरपा से दुध, घी की तो कोई कमी न थी, घर की गाय जो थी।

शाम को दोनों बच्चे शाला से लौट आए, आते ही मुनिया ने हल्ला करना शुरु कर दिया, मां, मां बहुत जोर की भुख लगी है, जल्दी खाना लाओ।

हां बेटा तुम लोग हाथ मुंह धोकर बैठो मैं अभी गर्मा गरम साग तथा पुड़ियां लेकर आती हुं। कमला ने कहा, कुछ ही देर में खेत से थक हार कर रमेश भी घर आ गया था. कमला ने सभी को खाना खीलाया।

बुढिया ने भी आज छक कर खाना खाया, कमला को ढेरों दुआएं दीं, भगवान सबको ऐसी अन्नपुर्णा बहू दे, जुग जुग जीए, फ़ुले फ़ले ...आदी और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई।

रात दस बजे के करीब अचानक, मौसम ने रुख बदला. ठंडी हवाएं चलने लगीं, जोरदार गर्जना के साथ बिजली चमकने लगी, ठंडी हवाओं ने अब तुफ़ान का रुप ले लिया था और प्रचंड वेग से अपना रौद्र रुप दिखाने लगी। रमेश तथा कमला की नींद भी बदलों की गड़गड़ाहटों से खुल चुकी थी और दोनों खिड़की से झांकने लगे।

मौसम का रुख पल प्रतिपल भयानक हो रहा था, पुरे गांव में जैसे भुचाल आ गया था, तेज हवाएं दरख्तों को उखाड़ अपने साथ लिए जाने पर पर आमादा थीं, बारिश इतनी तेज थी की कुछ ही मिनटों में नदी नाले उफ़नने लगे, और अब कुदरत का कहर बड़े बड़े ओलों के रुप में धरती पर गिरने लगा।

उधर आसमान से ओले गिर रहे थे और इधर कमला की आंखों से जार जार आंसु.....हे भगवान अगर कुछ देर में बारिश नहीं रुकी तो पकी फ़सल खड़े खड़े बर्बाद हो जाएगी...कमला ने कहा, रमेश ने सांत्वना के स्वर में कहा..

अरे क्यों परेशान हो रही है? अभी रुक जाएगा पानी, लेकिन रुह तो अन्दर तक रमेश की भी कांप उठी थी।

बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, लगातार चार घंटे कहर बरपाने के बाद इंद्र देवता शांत हुए. आधी रात को ही कमला रमेश से खेत पर जाने की जिद करने लगी। रमेश ने समझाया, इतनी रात को, ऐसे मौसम में, इस भयावह अंधकार में हम कैसे खेत पर जायेंगे ? अभी सो जा भोर होते ही चलेंगे।

लेकिन नींद तो जैसे दोनों की बैरन बन गई थी, आधी रात आंखों में काटने के बाद सुबह होते ही दोनों खेत की ओर भागे.....भागते भागते दोनों की सांसे फ़ुल गईं थीं, और जैसे ही दोनों खेत पर पहुंचे वहां का नज़ारा देखकर दोनों की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

चार घंटे लगातार ओले गिरने से पुरी फ़सल चौपट हो चुकी थी, गेहुं की लंबी लंबी बालियां जिन्हें देखकर रमेश का सीना गर्व से दोगुना हो जाता था, आज जमीन चाट रहीं थीं, चने के गुच्छों से लदे पौधे जमीन पर चीत्त पड़े थे. खेतों पर चारों ओर ओलों के रुप में बर्फ़ फ़ैली थी।

कुछ नहीं बचा कमला......सब बर्बाद हो गया। खेतों में बर्फ़ जमी थी. बीज के लिये अनाज भी नहीं बचा.. सारी उम्मीदों, सारे सपनों पर पानी फ़िर गया।  
कमला और रमेश दोनों किंकर्तव्यविमुढ से अपनी बर्बाद फ़सल को देख रहे थे, कमला तो स्तब्ध थी लेकिन रमेश को अपनी उजड़ी फ़सल के निचे दबे एक जोड़ी सोने के झुमके दिखाई दे रहे थे...एक ऐसा सपना जो उसकी फ़सल के साथ ही बर्बाद हो गया था।

                                                                                                                    ११ मार्च २०१४                        

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अधूरा सुख

भगवान भी कभी कभी कुछ ज्यादा ही कठोरता दिखाते हैं, कहीं बाढ तो कहीं सुखा, किसी की झोली में दुनिया भर की खुशीयां तो कोई दो वक्त की रोटी को मोह्ताज, जिसको बच्चों की कोई चाहत नहीं उसको दर्जन भर बच्चे और किसी को पुरी ज़िन्दगी औलाद के लिये तरसते हुए जीना पड़ता है।

 पड़ोस में रहने वाली सुमन को मैनें हमेशा ही बच्चों के लिये तरसते हुए देखा, आठ वर्ष हो गए थे उसकी शादी को लेकिन अब तक उसे मात्रत्व का सुख प्राप्त नहीं हुआ था, वह सुख जिसके बिना स्त्री कभी अपने आप को संपूर्ण महसूस नहीं कर पाती। लेकिन सुमन की नियति मेरी समझ से कुछ परे थी, अपने बच्चे के लिये दिन रात तरसती सुमन को दुसरों के बच्चे फ़ुटी आंख नहीं सुहाते थे, रंग बिरंगे सुन्दर फ़ुलों की तरह कोलोनी में खेलते कुदते नन्हे मुन्ने बच्चे सुमन को कांटों की तरह चुभते।

एक दिन तो हद हो गई, मेरा दो वर्ष का अबोध बेटा चलते चलते उसके आंगन में सूख रहे धनिया के थाल के नजदीक पहुंच गया और धनिया के थाल के पास बैठ गया और थोड़ा सा धनिया बिखेर दिया, जैसे ही सुमन की नजर बिखरे हुए धनिया और पास ही खेल रहे मेरे बेटे पर पड़ी, उसने अपना आपा खो दिया और गुस्से में तमतमाते हुए जोर जोर से बोलने लगी, पता नहीं कैसे कैसे बच्चे पैदा कर देते हैं और लोगों के आंगन में छोड़ देते हैं। जैसे ही मेरे कानों में उसकी आवाज़ पड़ी मैनें दौड़ कर अपने बच्चे को उठाया और उसे डांटने लगी, अब इतना छोटा बच्चा भला बुरा तो कुछ समझता नहीं था सो मेरी डांट सुनकर रोने लगा।

मैनें पलटकर सुमन को सिर्फ़ इतना ही कहा  "सुमन मैने अपने बच्चे को सिखा कर नही भेजा था की वो तुम्हारा नुकसान करे" इतना सुनते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वो जोर जोर से बड़बड़ाने लगी। मैं पलटकर कहना तो चाहती थी की आपको शायद भगवान इसीलिये बच्चे नहीं देता क्योंकी आपके ह्रदय में ममता नहीं है, पर मैने अपने शब्दों को अपने मन में ही दफ़न कर दिया और यह कह्कर वहां से चल दी की मेरे बच्चे ने आपका जो नुकसान किया है उसकी भरपाई मैं आपको आपका धनिया लौटा कर कर दुंगी। उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हम दोनों में बोलचाल बंद रही, लेकिन जल्द ही मैनें यह सोच कर की बेचारी के साथ भगवान ने अन्याय किया है, और शायद इसीलिये चिड़चिड़ी हो गई है बोलचाल चालु कर दी। मैं भी यह बात जानती थी की उसके मन में भी कोई कपट नहीं है।

सुमन हर समय मेरे सामना अपना दुखड़ा रोती रहती थी, रीना मैं क्या करुं कुछ समझ में नहीं आता कहां जाऊं सब जगह इलाज करवा लिया एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, रुहानी झाड़ फ़ुंक, पूजा पाठ, मान मनौव्वल सब कुछ लेकिन कहीं से उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती। हर महीने सोचती हुं काश इस महिने पीरियड नहीं आये... या फ़िर किसी महिने किसी भी कारण से पीरियड मिस होता है तो मन में आशाओं के ढेरों दिप जगमगा उठते हैं लेकिन ये खुशियां कुछ ही दिनों की मेहमान होती हैं और फिर अगले महीने का इन्तज़ार...बोलते बोलते उसका गला भर आता

मैं उसको समझाती - सुमन कभी कभी कई सालों के बाद भी उपरवाला मेहरबान होता है एक दिन वो तुम्हारी भी सुनेगा, धीरज रखो और भगवान पर विश्वास रखो मैं कभी भीउसके दुख और ईर्ष्या में अन्तर नहीं समझ नहीं पाई, वह नये नये जोड़ों को गोद में बच्चा लिये देखती तो वित्रष्णा से भर उठती, अब इसमें उसका दुख छिपा था या ईर्ष्या या शायद दोनों का मिश्रण ?

एक दिन दोपहर में सुमन बच्चों को जोर जोर से डांट रही थी। बच्चों का जुर्म यह था की वे घर के सामने खाली पड़े मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे, जिसके शोर से उसकी दोपहर की निंद खराब हो गई थी और वो बच्चों को इसका जिम्मेदार ठहरा रही थी।
कई बार इस तरह की घटनाओं से बच्चों के माता पिता को बुरा भी लगता था लेकिन सब उसकी वेदना को समझते थे और चुप रह जाते. सुमन को मैनें बहुत करिब से देखा था, उसका लड़ना झगड़ना, रोना सिसकना सब कुछ मैं समझती थी और इस निष्कर्ष पर पहुंची थी की वो दिल की भली ही थी. दर असल वह अपने दुख से इतनी ज्यादा दुखी थी की कोई उसे लाख चाहकर भी समझ नहीं पाता, हर समय बच्चे की चाहत जो अब तक सनक का रुप ले चुकी थी सुमन के दिलो दिमाग पर हावी रहती।

मैं मौका देखते ही उसके दुख को हल्का करने की गरज से उसे समझाने बैठ जाती "मेरी सलाह मानो तो एक बच्चा गोद ले लो, प्यार से पालने पोसने से तो एक कुत्ते के बच्चे से भी प्यार हो जाता है, पर वह मेरी सलाह पर ज्यादा ध्यान नहीं देती।

एक दिन सुमन छत पर खेल रहे पड़ोस के बच्चों को डांट रही थी - चलो जाओ छत पर दौड़ भाग मत करो अंकल का सर दर्द कर रहा है, मासूम बच्चे डांट सुनकर रुआंसे होकर आपस लौट गये. मैनें सुमन को टोकते हुए मजाक में कहा - सुमन अगर तुम्हें बच्चे होंगे और मस्ती करेंगे तब भैया का सर दर्द होगा तो तुम उन्हें कहां भेजोगी ? उसके पास मेरी बात का कोई जवाब नहीं था लिहाजा वह चुप ही रही।

सास ससुर भी जब कभी सुमन के घर आते तो वे भी हमेशा खुश खबरी सुनने को आतुर रहते थे, पर वे कभी सुमन को कोसते नहीं और न ही उस पर कभी कोई तानाकशी करते, भगवान की मर्जी समझ कर सब मौन रह जाते. उसके पति भी सुलझे हुए तथा समझदार व्यक्ति थे अत: वो भी कभी सुमन पर औलाद के लिये दबाव नहीं डालते थे।

सुमन अक्सर मुझसे कहती:

रीना ..मेरी फ़ैमिली कब कम्पलिट होगी ?

मैं कहती, सुमन ऐसा नहीं है जिनके बच्चे नहीं होते वे भी खुशी से जीवन जीते है।

मेरी बात को अनसुना कर वह अपनी ही रौ में कहे जाती ...हम दोनों का सहारा कौन बनेगा?

कई बार तो मैं मन ही मन झल्ला उठती कि सुमन..क्या बच्चे के अलावा तुम्हारे पास और कोई विषय नहीं है बात करने के लिये? वह मन मसोसकर चुप रह जाती।

एक दिन बड़ी प्रसन्न मुद्रा में चहकती हुई सुमन मेरे घर आई।

रीना ......रीना,  कहां हो, देखो मैं आज तुम्हारे लिये गाजर का हलुआ लाई हुं, तुम्हें बहुत पसंद है ना, कहते हुए उसने मेरे हाथों में गर्मागरम गाजर हलुआ थमा दिया और सोफ़े पर बैठ गई और बच्चा गोद लेने के विषय में बात करने लगी, मुझे बहुत खुशी हुई की चलो देर से ही सही इसे अकल तो आई।

एक दिन कलोनी की कुछ औरतें दबी जुबान में बातें कर रहीं थीं कि मैदान के पिछे वाले नाले के पास एक कपड़े में लिपटा हुआ बच्चा कोई छोड़ गया है, हाय...कैसी बेरहम मां होगी जो अपने फूल से प्यारे नवजात को मरने के लिये छोड़ गई है।

बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर कुछ भले लोगों ने बच्चे को उठा कर पुलिस स्टेशन तक पहुंचा दिया, कुछ दो चार दिन के लिये पुलिस ने थाने में ही बच्चे को सम्हालने की व्यवस्था कर दी, इस आशा में की शायद कोइ परिजन बच्चे को लेने आ जाएं, लेकिन उस अभागे बच्चे को लेने कोइ नहीं आया।

सुमन तथा उसके पति को भी यह बात पता चली तो उन्हें कहीं न कहीं अपना वर्षों का अधुरा सपना पुरा होता हुआ दिखाई दिया। वे दोनों आपसी सहमती से पुलिस थाने गए और सारी जरुरी औपचारिकतायें पुरी करके बच्चे को गोद लेकर घर ले आए, उनके लिये ज्यादा खुशी की बात यह थी की वह बच्चा लड़का था।

सुमन अब बहुत खुश नज़र आती, बच्चे की किलकारियों के साथ मुझे सुमन की भी किलकारियां सुनाई देतीं, लगता था उसका भी बचपन लौट आया था. कभी हर समय दुख के समंदर में डुबी रहने वाली सुमन अब हर समय चहकती रहती। समय अपनी गती से चलता जा रहा था। सुमन ने अपने बच्चे का नाम रखा "निनाद"।

सुमन को बेसब्री से इन्तज़ार था उस लम्हे का जब बच्चा उसे "मां" कह्कर पुकारेगा. वह शब्द जिसे सुनने के लिये सुमन ने आठ साल गम के आंसु पिए थे, उसे उम्मीद थी की जिस दिन "निनाद" उसे मां कहकर पुकारेगा शायद वह दिन वह पल उसके लिये जीवन का सबसे सुखद पल होगा। चारों दिशाओं से उस सुमधुर ध्वनि का निनाद होगा... मां...मां...मां...मां........

लेकिन यह क्या एक साल बीता, दुसरा साल बीता....निनाद तो अपने नाम के सर्वथा विपरीत खमोश ही रहा।

और एक दिन जब उसे डाक्टर के पास चेक अप के लिये ले जाया गया, तो डाक्टर ने खुलासा किया की बच्चा गुंगा है और कभी बोल नहीं पाएगा. सुमन के उपर ऐसा वज्रपात हुआ की वह आंखें फ़ाड़ फ़ाड़ कर पत्थर की मुरत बनकर डाक्टर साहब को देखती रही।

सुमन अब अपने आप को ठगा सा मह्सुस कर रही थी, न कुछ बोली और न ही रोई, निनाद को गोद में उठाकर अपनी राह चल पडी।

शायद विधाता ने उसकी किस्मत में यही लिखा था......अधुरा सुख।