शनिवार, 27 सितंबर 2014

माँ का फैसला



रमजान का पाक महिना था, हर कोई खुश और व्यस्त था. मस्जिद के आस पास खुब चहल पहल थी. खाने पीने की छोटी छोटी दुकाने सजी थी जिनमें जलेबी, पापड़, कीमे के समोसे तथा और बहुत सारी खाने की चीजें सजी थी. नमाज अदा कर निकलते बच्चे बूढ़े, जवान सर पर टोपियां पहने खुश नजर आ रहे थे. रोजे खुलने के वक्त पर सभी लोग घरो मे दुबक जाते, एक दुसरे के घरों में सजी धजी थालियों में पकवानो का अदान प्रदान हो रहा था. 

मस्जिद से अजान की आवाज आने पर फ़रिदा का ध्यान हटा और वह सिर पर दुपटटा रखकर नमाज पढ़ने लगी, तभी दरवाजा खटखटाने कि आवाज आई. फरीदा के उठते उठते खटखटाने की आवाज तेज होने लगी थी. फ़रिदा ने जैसे ही दवाजा खोला तो देखा की उसका बेटा इमरान बदहवास सा दरवाजे पर खड़ा था, जैसे ही दरवाजे के पट खुले इमरान घबराया सा दौडते हुये अन्दर आया और अन्दर से कुंडी लगा ली. गुस्से मे तमतमाते हुये इमरान ने कहा इतनी  देर से दरवाजा पीट रहा था दरवाजा क्यो नही खोल रही थी? नमाज पड रही थी बेटा फ़रिदा ने कहा. इमरान ने अपने डर पर काबु पाते हुये कहा, अम्मी कोई आये तो किवाड मत खोलना और मैं घर में हुँ यह भी मत बताना. इमरान बुरी तरह से परेशान था. फ़रिदा आज भी समझ गयी कि उसका इकलौता बेटा कोई गुनाह कर के आया है, तभी इमरान ने कहा अम्मी मैने कुछ नहीं किया, मैं सच कह रहा हुँ.......   तु चिन्ता मत कर बेटा मैं तुझे बचा लुंगी फ़रिदा ने कहा, तभी कहीं दुर से पुलिस की गाड़ी का  सायरन सुनाई दिया.

इमरान की सांस धौंकनी कि तरह चल रही थी, वह पसीने से नहा रहा था. अम्मी मैनें कुछ नही किया इमरान ने झुठ बोला....तो तु इतना क्यों डर रहा है जब तुने कोई गुनाह ही नही किया,   फ़रिदा ने कहा. देख इमरान तु ऐसे जुर्म करना छोड़ दे बेटा कब तक ऐसे पुलिस से डरता और भागता रहेगा?  सायरन की आवाज अब करीब आती जा रही थी...इमरान घर मे मुनासिब जगह देखकर छुप गया था. दरवाजे पर ठक ठक की आवाज़ से फ़रिदा भी डर गयी, अम्मी दरवाजा मत खोलना..इमरान ने रोका फ़रिदा ने दरवाजा खोल दिया, सामने पुलिस खडी थी, एक अफसर ने पूछा, ये घर इमरान का है? फ़रिदा ने हाँ मे सिर हिला दिया. कहाँ है वो? उसे हमारे हवाले कर दो नही तो हमें जबरन तलाशी लेनी होगी. पर साहब उसने किया क्या है? फ़रिदा ने मासूमियत से पुछा. इतनी भोली ना बन बुढ़िया अब तक तो छोटी मोटी चोरीयां, राहजनी करता रहता था पर इस बार उसने ऐसा काम किया है की जमानत भी नही होगी..खुदा के वास्ते एसा मत कहो साहब, फ़ारिदा ने हाथ जोड़कर  कहा. दो तीन सिपाही घर मे तलाशी लेने लगे, कहाँ छुपा रखा है उसे तभी पिछ्ला दरवाजा खुला दिखा... भाग गया साहब. भाग गया या तुमने उसे भगा दिया पीछे के रास्ते से? खुदा की कसम साहब रोजा है झुठ नही बोलूंगी वही भाग गया, फ़रिदा ने ईश्वर का वास्ता दे कर कहा तो पुलिस इन्सपेक्टर ने जाते जाते फ़रिदा को समझाया वो आये तो उसे पुलिस स्टेशन भेज देना वरना हमे उसे गिरफ़्तार करना होगा. वो किसी महिला के गले से सोने कि चैन छिनकर भाग रहा था पर वो चैन टुट गयी. हाँ साहब मै समझ गय़ी फ़रिदा की आँखों से आंसू छलक आये.

बुढ़ी माँ के जीने का एक मात्र सहारा, एकलौता बेटा था इमरान, शौहर तो कुछ साल पहले ही इस दुनिया से रुखसत हो गये. क्या खाक मेरे जीने का सहारा बनेगा, फरीदा ने बड़बड़ाते हुए सिर पर दुपट्टा रखा और नमाज पढने बैठ गई. दोनो हाथ फैलाकर अल्लाह से दुआ माँगने लगी, आँखों से  लगातार आंसु बह रहे थे और दिल से फरियाद ...या अल्लाह मेरे बेटे को सही राह पर ला दो इसके बाद मैं आपसे कुछ नही मांगूंगी, वो चोर बनेगा मैंने सपने में भी सोचा था. उसके अब्बु की रूह  कितनी बेचैन होगी उसकी ये हरकतें देखकर, सोचते होंगे ...फ़रिदा तुमने बेटे की परवरिश अच्छी नही कि और वो चोर बन गया. 
 
 फ़रिदा के शौहर सरकारी मदरसे में उर्दु पढाते थे. उनके मरने के बाद फ़रिदा को पेन्शन मिलती थी जिससे वह अपना गुजारा कर लेती थी. रोजा खोलने वक्त हो गया था परन्तु फ़रिदा ने न तो कुछ बनाया था और नही कुछ खाने कि इच्छा थी, तभी अन्जुमन खाला आ गई जो फ़रिदा कि पडोसन है,  "फ़रिदा ले मैं कुछ खाना लाई हुँ अब रोजा खोल ले......

नही खाला मुझसे कुछ नही खाते बनेगा, भुख ही मर गयी है....

अल्लाह सबका भला करेगा सब्र रख फ़रिदा, अन्जुमन खाला ने समझाते हुए कहा ..खाला आप जब आती हो तो मन कुछ हल्का हो जाता है, फ़रिदा ने कहा....अच्छा बाद मे आती हुँ रोजा खोलना है खाला ने कहा और बाहर निकल गई. 

फ़रिदा कभी खाने को देखती तो कभी अपने बेटे के बारे मे सोचती. पता नही कहाँ मारा मारा फ़िर रहा होगा पता नहीं कुछ खाया भी कि नही.......भला मेरे मुह मे टुकड़ा कैसे जायेगा? 

फ़रिदा का बेटा इमरान 19 बरस का है, 10 जमात मे दो बार फ़ेल हो गया. होशियार होते ही छोटी बुरी सोहबत में पड गया और छोटी मोटी चोरियां करने लगा और अंत में दो साल लगातार फेल  होने के बाद मदरसा भी छोड दिया था. अब मुह्ल्ले मे आवारागरदी करता फिरता है.......खैर खुदा ने दुख तकलीफ़ के साथ साथ पेट भी दे दिया है तो खाना तो होगा ही....थोडा बहुत खाने के बाद फरीदा बचा खाना बेटे के लिये रख कर बिस्तर पर जा लेटी. निंद तो आँखों से कोसों दुर थी... समय से पहले बूढ़ा गई पथरीली आँखों से से घर कि छ्त को ताक रही थी, ये रात इतनी लम्बी क्यों है? सुबह कब होगी? ये सोचते सोचते आखिर उसे निंद आ ही गई.

इमरान तो रात भर नही आया पुलिस से डरकर कही छुपा होगा तभी पड़ोस का लड़का इमरान दोस्त दौड़ता दौड़ता आया और फरीदा से बोला "चाची इमरान जेल मे है...पुलिस ने उसे पकड लिया अकरम मुझे थाने ले चल मैं  छुड़ाउँगी अपने बेटे को फिर नेया जाने क्या मन में आया और गुस्से में मे बड़बड़ाती हुई बोली....मैं क्यों छुड़ाऊं? वहीं जेल मे सड़ने देती हुँ  कम से कम शान्ति तो रहेगी, पर उसके सीने में एक माँ का दिल भी था जो कमजोर हो गया था सो थाने जाकर अकरम की जमानत करवाई.   

पुलिस ने हिदायत दी.... अब सुधर जाओ अभी कुछ नही बिगडा है, आखिर कब तक ऐसे जुर्म करोगे? बेचारी मां कब तक  तुम्हे छुडाती रहेगी? साहब अब  मैं सही रास्ते पर चलूंगा, कोई गलत काम नही करूंगा मेरा विश्वास किजिए... इमरान ने कहा. फ़रिदा अपने साथ इमरान को घर लेकर आई, नहाने का पानी गरम किया. वो नहा रहा था तब तक फ़रिदा ने जल्दी जल्दी सब्जी रोटी बनाई और उसे खाना परोसा.

....नही अम्मी मैं नही खाउंगा, मैं रोजा रखूंगा, अब से कोई गुनाह नही करूंगा. ये पाक महीना है बेटा, इसमे लोग अच्छे काम करते हैं और तु तो गुनाह कर रहा है. फरीदा ने इमरान को समझाते हुए कहा ...तेरा पढने मे जी नही तो मैं तुझे कहीं काम पर लगवा दूंगी. इमरान ने हाँ मे सिर हिला दिया. कुछ ही दिनो मे फ़रिदा ने एक कपडे की दुकान पर बात करके इमरान को नौकरी करने के लिए भेजा. इमरान रोजाना ठीक समय पर दुकान जाता पर उसका मन नही लग रहा था. तनख्वाह तो 30 दिन काम करने के बाद उसे मिलने वाली थी पर उसे तो खुब सारे पैसे हाथ मे रखने की आदत थी.

एक दिन फ़रिदा पेटी खोलकर पैसे निकालने लगी तो देखा चार हजार में से दो हजार गायब थे उसने सोचा था ईद आने वाली है इमरान के लिए नए कपडे खरीदूँगी. पैसे कम देखकर उसका माथा ठनका, वो समझ चुकी थी कि इमरान ने घर के पैसों पर भी हाथ सॉफ कर दिया था. फरीदा  सोचने लगी.....इमरान सही राह पर कभी नही चल सकता. ये मेरी भुल है कि मैने उस पर यकिन किया.शाम को दुकान से लौटने पर फ़रिदा ने पुछा.....इमरान तुमने पेटी मे रखे पैसे लिये? हाँ  अम्मी इमरान ने सिर झुकाकर कहा तुम्हे क्यों चाहिये थे? और जरुरत थी तो तुम मुझसे मांग लेते, चोरी करने की क्या जरुरत थी? मैं तो समझ रही थी की तुम सुधर गये होंगे पर यह सोचना मेरी बहुत बड़ी भुल थी. तुम्हारे अब्बु की कितनी ईज्जत थी गांव में और तुम उनकी ईज्जत इस तरह से उछाल रहे हो. मैं तो थक गयी हुँ तुम्हें समझाते समझाते. फ़रिदा निढाल हो कर बैठ गई. इमरान के पास कोई जवाब नही था सो वह चुप ही रहा. फरीदा ने अपना बोलना जारी रखा ...तुम चाहो तो इस घर से जा सकते हो, मैं समझूँगी मेरा कोई बेटा नही है फ़रिदा ने कहा. अच्छा हुआ तुम्हारे अब्बु ये दिन देखने से पहले ही इस दुनिया से चले गए नहीं तो वो ये सब देखकर खुदकुशी कर लेते. मुझे भी अल्लाह ने ना जाने क्यों जिन्दा रखा है, काश मैं भी उनके साथ चली जाती तो अच्छा होता. 

फ़रिदा खाना बनाते बनाते बोल रही थी पर इस बार इमरान ने कोई झुठा आश्वासन नही दिया उठकर घर से चला गया. अजान होने पर फ़रिदा ने रोजा खोला, खाना खाने बैठी तो इमरान का चेहरा आँखों के सामने आ गया परन्तु इस बार उसने मन को कठोर किया, खाना खाया और बाहर आ कर खडी हो गई. 

आज चार दिन हो गये इमरान घर ही नही लौटा, परसों ईद है सब लोग खुशियां मना रहे हैं, तरह तरह के पकवान बनेंगे शीरा, खुरमा, सिवईयां, फेनी और तरह तरह की मिठाइयां. बच्चे औरतें सभी नये कपडे पहनेंगे. मै क्या तैयारी करूं ईद कि यह सोच कर फ़रिदा दुखी थी, किसी ने बताया इमरान दो लड़कों के साथ पकडा गया अभी जेल मे है. फ़रिदा को तो जैसे सब मालुम ही था, यही सब होगा पर इस बार उसका गुनाह वह जानना नहीं चाहती थी, चोरी ही की होगी इस बार भी, मोटर साइकिलें भी चुराकर बेचता था. 

उसने थाने मे जाकर पता किया तो मालुम हुआ उन तीन लड़कों ने किसी लड़की के साथ बलात्कार किया था. बयान देने के बाद लड़की अल्लाह को प्यारी हो गई. फ़रिदा ने सुना तो बेहोश हो गई, कुछ देर बाद जैसे तैसे होश मे आई. उसकी आँखों मे आंसु सूख चुके थे, एकदम पत्थर बन गई थी. जैसे ही उसे थोड़ी चेतना आई पुलिस अफसर से मुखातिब होकर बोली "साहब आप  को गलतफ़हमी होगी, मेरा इमरान चोरी करता है पर ऐसा घिनौना काम नही कर सकता है. फ़रिदा ने रुंधे गले से कहा.... कोई गलतफ़हमी नहीं हुई है, हमें बिल्कुल सही जानकारी है तीनो ने अपना गुनाह थाने मे कुबुल किया है. फ़रिदा ने सुना तो ऐसा लगा जैसे अब कुछ नही बचा, सब खत्म हो गया. घर आ कर बेदम हो कर बिस्तर पर लेट गई. आज तो उसे नमाज पढ़ने की भी इच्छा नही हो रही थी.  सुबह ईद है पुरे मोहल्ले मे रौनक देखते ही बन रही थी, बच्चे बड़े सब नये नये कपड़े पहनकर, सिर पर सफेद टोपी लगाकर ईदगाह की ओर जा रहे थे,  सिवईयों की खुशबु ईलाइची के साथ मिलकर पुरे वातावरण को मीठा बना रही थी, उसे भी उत्साह था ईद का....... इमरान के नये कपडे बनवा लिये थे पर कौन पहनेगा? मैं किस खुशी मे त्यौहार मनाऊं?  फ़िर भी आस पडौस से सिवईयां और मिठाइयां आ चुकी थी. 

पुरा दिन ऐसे ही गुजर गया. इस बार उसने मन ही मन सोचा मैं भी कोर्ट मे जाउँगी, एक फैसला लेना है, एक ऐसा फैसला जिससे मेरे जमीर को तथा मेरे मरहूम शौहर की रूह को सुकून.

कोर्ट मे पेशी हुई, दोनो हाथों में हथकड़ी पहने तीनो लड़के खड़े थे फ़रिदा जैसे ही उसके पास पहुंची इमरान बोला... अम्मी मुझे बचा लो, बचा लो अम्मी अब ऐसा कुछ नहीं करूंगा. इमरान रोते रोते गिड़गिडा रहा था....गलती हो गई अम्मी तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूंगा.

लेकिन इस बार फ़रिदा चुप थी, पानी सिर से उपर हो चुका था, कुछ लोग कानाफ़ुसी कर रहे थे कैसी माएँ होंगी जिन्होनें ऐसे जल्लाद बेटों को जन्म दिया.... फ़रिदा के कानों मे ये शब्द ऐसे जा रहे थे मानो किसी ने कानों में पिघला शीशा डाल दिया हो. तीनों अपराधी कठघरे में खडे थे, जज साहब आ चुके थे, आज पुरी अदालत खचाखच भरी थी एक संगीन जुर्म का फ़ैसला जो होना था लड़की की मां बददुआ दे रही थी, उसके आंसु झर झर बह रहे थे......मेरी बेटी की आत्मा को शान्ति तभी मिलेगी जब इन राक्षसों को फांसी मिलेगी

फ़रिदा अचानक खडी हुई और बोली जज साहब मुझे कुछ कहना है........जज साहब ने कहा आपको जो भी कहना है विटनेस बाक्स मे आ कर कहें. जैसे ही फ़रिदा कठघरे मे पहुची एक बार उसकी आँखें अपने बेटे पर पड़ी इमरान की आँखों में राहत पहुंची उसे लगा जैसे मां आ गई है और उसे अपने आंचल में छुपा लेगी, सजा से बचा लेगी. 

जज साहब ये मेरा बेटा है पर उससे पहले ये एक संगीन अपराधी है इमरान ने सुना तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई, अपनी मां को ऐसे देख रहा था जैसे बकरा कसाई को देखता है..... एक निरीह जानवर की तरह मायुस होकर वह मां को याचना भरी नज़रों से देख रहा था.....फरीदा अपनी रौ में बोले चली जा रही थी......जज साहब अगर मेरी औलाद ने इतना संगीन जुर्म किया है तो उसे फांसी मिलनी ही चाहिए. उसका जिन्दा रहना दुनिया के लिये खतरनाक है...जज साहब इसको फांसी पर लटका दिजिए, ताकि समाज मे ऐसा अपराध करने से लोग डरें

मेरा बेटा चोरी करता था तब तक ठीक था पर आज इसने वो गुनाह किया है जो माफी के काबिल नहीं है मै एक मां हुँ, और समझ सकती हुँ उस मां की पीड़ा को जिसकी बेटी के साथ यह घिनौना गुनाह हुआ....उस मा पर क्या गुजर रही होगी. मैनें तो मेरा बेटा उसी दिन खो दिया था जिस दिन उसने ऐसा गुनाह किया.

इमरान बचने की उम्मीद छोड सिर नीचा करके रो रहा था. कठघरे से उतरकर फ़रिदा अदालत में  बैठ गयी, लोग उसके बयान पर तालियां बजा रहे थे. अदालत से बाहर निकली फ़रिदा एक ऐसे अपराधी की मां थी जिसे फांसी हो रही थी

या अल्लाह मुझे ताकत देना की मैं इस गम को सह सकूं, गम ये नहीं है की आज मेरा बेटा फांसी पर चढ़ रहा है बल्कि गम ये है की मेरी कोख ने ऐसे जालिम को जन्म दिया........फ़रिदा के दिल पर पडा पत्थर हट चुका था और आज वो खुलकर सांस ले पा रही थी..... धीरे धीरे भारी कदमों से वह अपने घर की ओर बढ रही थी........... अब वह इस दुनिया में अकेली थी.......नितांत अकेली.

                                                         
                                                               कविता भालसे 
                                                               27 सितंबर 2014

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

जल्लाद

मुसलाधार बारिश के साथ हवा, आंधी चल रही थी और जोर की आवाज़ों के साथ बिजली गरज रही थी. बाहर ऎसा तुफ़ान मच रहा था जैसॆ प्रलय आने को है. मुनिया अपने पति के इन्तज़ार में थी, उसने खाना बना कर रखा था.
एक डेढ घंटे के बाद बारिश थमी, पैरों की आहट से मुनिया समझ गई की उसका पति रमेश आ चुका है. दरवाजे की कुंडी की लगातार खड़खड़ाहट सुनकर मुनिया दरवाजे की ओर दौड़ी, दरवाजा खुलते ही दारु की जबर्दस्त बदबु भी उसके साथ अन्दर आई, लड़खड़ाते कदमों से जैसे अपने शरीर को घसीटता हुआ वह अंदर आया.

मुनिया ने दबी आवाज़ में पुछा - खाना ले आउं ?

क्या बनाया है आज खाने में ? रमेश ने रौबदार आवाज़ में पुछा.

भिंडी की सब्जी है. मुनिया मिमियाते हुए बोली.

स्साली.....अब यह घास फ़ूस ही बचा है मेरे खाने को? भिंडी तु खा और मेरे लिये ये बना. कह्ते हुए उसने मुनिया की ओर मांस की थैली उछाल दी.

मुनिया रमेश के सख्त स्वभाव को भलीभांति जानती थी अत: चुपचाप मांस पकाने बैठ गई. जरा मसालेदार और चटपटा बनाना.......रमेश ने कहा.

रमेश सिर्फ़ नाम का ही नहीं काम का भी जल्लाद था, वही जल्लाद जो जेलों में सजायाफ़्ता कैदियॊं को मौत देने का काम करते है. जितना वह शरीर से काला, लंबा चौड़ा और कुरुप था उससे कहीं ज्यादा ह्रदय से कठोर था, उसके लिये कोई भी रिश्ता नाता कुछ मायने नहीं रखता था. प्यार, प्रेम, दया, ममता, जैसी भावनायें भगवान उसमें डालना ही भुल गया था.

खाना खाने के बाद अपनी चारपाई पर सोने पहुंचा पर अपनी बुढी मां की लगातार चलती खांसी से बार बार उसकी निंद उचट रही थी. गुस्से में बकने लगा - इतना खांसती है बुढीया की न तो सोते बनता है न जागते, जी करता है इसका टेंटुआ दबा दुं.....हमेशा की झंझट खतम. मुनिया ने डरी डरी अवाज में बोला, अब बेचारी कहां जाकर खांसेगी.

रमेश जल्लाद का मन न जाने कब का मर चुका था, या शायद कभी जन्मा ही नहीं था. उसका पांच वर्ष का एक बेटा छोटु था जिसे वह कभी अपने पास नहीं फ़टकने देता था, न ही कभी उसके सर पर हाथ फ़ेरता था.

मां, बाबा ऐसे क्यों हैं? छोटु ने अपनी मां से पुछा.
कुछ नहीं बेटा, वे तो अच्छे हैं, लेकिन जल्लाद का काम करते करते ऐसे हो गए हैं. मुनिया ने जवाब दिया.

मां ये जल्लाद क्या होता है? छोटु ने उलटे प्रश्न पुछा तो पीछा छुड़ाने के लिये मुनिया ने कहा बाद में बताउंगी.       

बचपन में रमेश भी और बच्चों की ही तरह था लेकिन जैसे जैसे बड़ा होता गया अपने बाप दादाओं की तरह गुणों तथा कर्म से भी जल्लाद बनता गया. उसके बाप दादा सरकारी जल्लाद थे तथा गंभीर अपराधियों को फ़ांसी देने का काम करते थे.

रमेश ने बड़ी खुशी तथा गर्व से अपने बाप के काम को अपनाया तथा खानदान की परंपरा को आगे बढाया. उसकी जींदगी की पहली फ़ांसी के समय भी उसका सीना तना रहा, न डर न घबराहट न दया, पूरी तरह बेखौफ़ रहा वह. अपने हाथों से उसने रस्सी का फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े से बने थैलीनुमा आवरण से कैदी का चेहरा ढंका, लीवर खींचा और खटाक की आवाज़ के साथ कु्छ ही पलों में कैदी फ़ंदे पर झुल रहा था.

इस काम के एवज में उसे कुछ रुपये मिले और अपनी इसी पहली कमाई से उसने पहली बार दारु को भी गले लगा लिया और तब से इन दोनों का चोली दामन का साथ है.

एक दिन छोटु की तबीयत खराब हुई और ऐसी हुई की कई दिनों के उपचार के बाद भी सम्हलने का नाम नहीं ले रही थी. उल्टी दस्त की वजह से वह बेहद कमजोर हो गया था, कई तरह के उपचार कराए गए लेकिन न तो दवा से और न ही दुआ से कोई फ़ायदा हो रहा था. इसी इलाज की भाग दौड़ तथा दिन प्रतिदीन बिगड़ती जा रही छोटु की हालत ने कब रमेश के पाषाण ह्रदय में भावनाओं के बीज अंकुरित कर दिये रमेश को खुद पता नहीं चला, आखिर को था तो उसकी ही औलाद, उसका अपना खुन, अपना अंश.

लेकिन भगवान को तो कुछ और ही मंजुर था, एक रात छोटु को बहुत तेज ज्वर आया, उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और शरीर बुरी तरह तप रहा था, मुनिया तथा रमेश उसे लेकर अस्पताल की तरफ़ दौड़े, बेहोशी की सी हालत में वह बुदबुदा रहा था बाबा...मैं कब ठीक होउंगा, मैं कब खेलने लगुंगा.....बोलते बोलते उस पर मुर्छा छाने लगी और फिर कुछ ही देर में उसने रमेश की गोद में ही दम तोड़ दिया.

जिंदगी में पहली बार रमेश की आंखों से आंसू टपक पड़े, उसका कठोर ह्रदय मोम की तरह पिघल गया. जिन हाथों से वह लोगों के गले में फ़ांसी का फ़ंदा डाला करता था आज उन्हीं हाथों में उसके इकलौते बेटे की लाश थी. कहते हैं जल्लादों के घरों में बच्चे ज्यादा नहीं जी पाते हैं. आज पहली बार रमेश को एह्सास हुआ की किसी की जान की कीमत क्या होती है?

समय का पहिया अपनी गती से चल रहा था, करीब दो वर्ष के बाद उसके यहां एक और बेटे का जन्म हुआ और इस बार उसे बाप बनने की खुशी हुई. अब वह अपने परिवार से प्यार करने लगा. मुनिया तथा रमेश की बुढी मां दोनों को रमेश का बदला रुप अच्छा लगने लगा. इधर कई सालों से रमेश ने जल्लाद का काम नहीं किया.

कुछ समय के बाद ही एक दुष्कर्म एवं हत्या के आरोपी को फ़ांसी की सजा मुकर्रर हुई और तारिख भी निश्चित हो गई, तारिख वही तय हुई जिस दिन उसके बेटे का जन्मदिन था. फ़ांसी की एक रात पहले रमेश को निंद नहीं आई और वह पुरी रात करवटें बदलता रहा. उसके मन में यह बात घर कर गई की फ़ांसी देने से ईश्वर का प्रकोप उस पर फ़ुटता है और और इसकी सजा उसकी संतान को मिलती है. वह इस सजा को ईश्वर का न्याय समझता था, पर क्या करता काम तो काम होता है चाहे जैसा भी हो, फ़िर कभी उसे यह भी लगता की इन्सान का कर्म ही उसकी पूजा होती है, ईश्वर ने उसके खानदान को रोजी रोटी के रूप में यही कर्तव्य सौंपा है तो इसमें उसकी क्या गलती है ? इसी उधेड़बुन में रात निकल गई.

सुबह होते ही वह उठा और मुनिया से बोला - मैं जेल जा रहा हुं, बच्चे का खयाल रखना, यह कहते हुए उसका गला भर आया. उसके आंसु मुनिया से भी छुपे नहीं रह पाए, वह भर्राये गले से बोला - हे भगवान तुने मुझे ऐसा काम क्यों दिया है?

मुनिया समझाते हुए बोली - काम काम होता है, तुम उस कैदी से अपनी कोई निजी दुश्मनी थोड़े ही निकाल रहे हो, तुम न करोगे तो कोई और करेगा और बुरे कर्म का फ़ल भी तो मिलना चहीए ना.

अपने नन्हे से बच्चे को जन्मदिन का आशिर्वाद देते हुए उसने रुंधे गले से जीते रहो कहा और तेज कदमों से घर से बाहर निकल गया. आज पहली बार उसका दिल जोरों से धड़क रहा था और हाथ कांप रहे थे.

रास्ते में उसने एक एक अद्दी दारु पी ताकी उसका आत्मविश्वास न डगमगाये. जेल जाकर वह अपने काम में लग गया. कांपते हाथों से फ़ंदा तैयार किया, काले कपड़े का आवरण तैयार किया और अपने सारे सामान के साथ जेल सुपरींटेंडेंट तथा अन्य अधिकारियों की उपस्थिती में फ़ांसी के लिये तैयार चबुतरे पर जा खड़ा हुआ जहां कैदी भी खड़ा था, लेकिन आज उसके होश उड़े हुए थे, जीन हाथों में फ़ंदा थामे था वे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे, कभी इन्हीं हाथों से अनगिनत बार वह मुजरिमों को फ़ांसी चढा चुका था, आज वही हाथ उसे चिढा रहे थे. शराब का सारा नशा उड़नछू हो चुका था.

जैसे ही उसकी नज़रें मुजरिम की आंखों से टकराईं तो किसी अन्जाने भय से निचे झुक गईं. रमेश सोचने लगा अपराध तो आवेश में आकर हो जाते हैं कोई जानबुझ कर अपने आप को ताउम्र सलाखों के पिछे सड़ने देना या फ़िर फ़ांसी के फ़ंदे पर झुलना नहीं चाहता, और फिर सुधार की गुंजाईश तो हर किसी में होती है. वह स्वयं एक पत्थर दिल इन्सान था लेकिन आखिर औलाद के प्रेम ने उसका भी तो ह्रदय परिवर्तन किया, और फ़िर अगर किसी की जान जानी भी है तो उसकी मौत का जिम्मेदार मैं क्यों बनुं? यह सोचते सोचते अनयास ही उसके हाथ का फ़ंदा निचे गिर गया, उसने फ़ंदे को उठाया और यंत्रचलित सा कैदी की ओर बढा, उसे काला कापड़ा पहनाया, और लीवर पर हाथ रखा.......लीवर दबाने के लिए उसने अपने शरीर की सारी शक्ती, सारी उर्जा इकट्ठी की लेकिन वह लीवर जिसे आज से पहले वह एक उंगली के इशारे से दबा दिया करता था आज उससे नहीं दब पाया.

वह दौड़ा और जेल अधिक्षक के पैरों में गिर कर रोते हुए कहने लगा - साहब आज और आज के बाद मुझसे यह काम नहीं होगा, मैं कड़ी मेहनत करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पाल लुंगा साहब लेकिन आज के बाद यह काम नहीं करुंगा......कहते हुए तथा रोते सिसकते हुए वह विपरीत दिशा की ओर बढ चला.....एक नई जिंदगी की शुरुआत करने.

मंगलवार, 11 मार्च 2014

मौसम


कमला आज बहुत ही खुश थी क्योंकि उसके पति रमेश ने आज अपने परिवार को राम लीला देखने ले जाने के लिये का वादा किया था। गांवों में मनोरंजन के साधन यही तो होते हैं रेडियो, नौटंकी या राम लीला। पास ही के गांव नेकपुर में मां दुर्गा का मेला लगा था, यह मेला मेला न होकर गांव वालों के लिये बहुत बड़ा उत्सव होता था दूर दूर के गांवों से ग्रामिण इस मेले का आनंद उठाने के लिये बैल गाड़ीयों में ठसा ठस भर कर कई किलोमिटर का सफ़र तय करके नेकपुर आते थे, क्या कुछ नहीं होता था नेकपुर के इस मेले में, छोटे बड़े तरह तरह के झुले, जादु का खेला, रंग बिरंगे मिट्टी के खिलौनों की कतारबद्ध दुकानें, बड़े बड़े तंबुओं से घीरे चलित सिनेमाघर, जलपान ग्रह से उठती गुड़ की जलेबियों की मदमस्त कर देने वाली खुश्बू, मौत के कुएं में जान जोखिम में डालकर फ़टफ़टी चलाते नौजवान, नौटंकी के टेंट से सटे लकड़ी के चबुतरे पर अपनी विचित्र भाव भंगिमाओं से दर्शकों को आकर्षित एवं आमंत्रित करतीं नर्तकियां........


कमला ने जल्दी जल्दी गाय का दुध दुह लिया. शाम का खाना बनाने बैठी तो खुशी के मारे उसके शरीर में कंपकंपी हो रही थी और उसकी रोटियां मन चाहे आकार ले रहीं थीं। इस संसार में हर व्यक्ति के लिये खुशी के मायने तथा परिभाषाएं अलग अलग होतीं हैं, सारा दिन खेतों में काम करने, गाय भैंसों की सेवा तथा घर के चुल्हे चौके में रमी रहने वाली कमला के लिये मेले में घुमने का प्रलोभन किसी दिवास्वप्न से कम न था।  

अपनी बुढी सास के लिये शकरकंद उबालकर अब कमला चुल्हे पर दलिया चढाने की तैयारी कर रही थी। बुढिया के दांत तो सालों पहले इस नश्वर संसार को अलविदा कह चुके थे लेकिन जिव्हा उसकी बढती उम्र के साथ साथ यौवन के नए पायदान चढ रही थी, अत: कमला को घर गिरस्ती के अन्य कामों के अलावा अपनी स्वादु सांस की जिव्हा का भी पुरा खयाल रखना होता था, क्योंकि बुढिया घर पर ही रुकने वाली थी।

शाम हो चुकी थी और अब रमेश भी खेत से आ चुका था, रमेश तथा अपनी बारह साल की बेटी मुनिया को खाना परोस कर कमला भी वहीं चुल्हे के पास बैठ गई। मुनिया को मेले में जाने की खुशी में भात का स्वाद भी अच्छा नहीं लग रहा था, खाते खाते पुछने लगी -

मां राम लीला देखने कब जायेंगे?

पहले अच्छे से खाना खा लो फिर चलेंगे, कमला ने कहा।

कमला ने अपनी लाल रंग की चमकीली साड़ी निकाली और पहनकर आंखों में काजल लगाया, माथे पर चटख लाल रंग की बिंदी लगाई, लाल रंग की चुड़ीयां पहनीं और इस तरह कमला का श्रंगार पुरा हुआ, कई महीनों के बाद  शायद आज तैयार हुई थी, एक भरपुर नज़र आइने पर डाली, अपने आप को निहारा और इठलाती हुई रमेश के सामने आई।

रमेश तो उसे देखता ही रह गया, जैसे पलक झपकाना ही भुल गया हो। उसे आज अपने आप पर गर्व मह्सुस हो रहा था. उसकी स्थिती उस कस्तुरी म्रग की तरह थी जिसकी नाभी में कस्तुरी छुपी होती है और वह उसे ढुंढने में पुरी जिंदगी लगा देता है।

अरे कमला आज तो तु बड़ी रूपवती लग रही है रे, रमेश ने छेड़नेवाले अंदाज़ में कहा।

मज़ाक मत करो....शर्माते हुए कमला ने कहा।

अरे नहीं रे, सच कह रहा हुं बड़ी सुंदर लग रही है।

धत्त....कमला ने शर्म से सर झुका लिया।

कमला, इस बार अच्छी फ़सल होगी ना तो तुझे सोने की झुमकीयां बनवा दुंगा.....रमेश ने कहा।

इतना सुनते ही कमला और भी प्रसन्न होकर चिड़ीयां की तरह फ़ुदकने लगी।

नौ बरस का छोटा मोहन भी मेला जाने के लिए मचल रहा था। दोनॊं बच्चों को तैयार करके अब कमला तथा रमेश अपनी बैल गाड़ी में जरुरत का समान रख रहे थे। पास पड़ोस के और भी परिवार मेला देखने जाने के लिये तैयार खड़े थे। शाम सात बजे तक सभी अपनी अपनी बैल गाड़ी में अपने परिवार के साथ सवार होकर नेकपुर की ओर चल दिये. अंधेरा हो चला था, गांव की गलियों से गुजरते हुए बैलगाड़ीयों का यह काफ़िला अब सुनसान पगडंडी पर आगे बढ रहा था. रात के सन्नाटे में बैलों के गले में बंधी घंटीयां कर्णप्रिय स्वरलहरियां छेड़ रही थीं।

ठीक समय पर काफ़िले ने नेकपुर की सीमा में प्रवेश किया, दुर से ही दिखाई देती मेले की तेज  लाईटें और लाउड स्पीकरों का शोर सभी के मन में रोमांच पैदा कर रहा था, खास कर बच्चे तो ऐसे अधीर हुए जा रहे थे जैसे कुछ ही देर में वे नहीं पहुंचे तो सब कुछ खतम हो जाएगा, मेले का शोर सुनकर बैलों में भी एक नई स्फ़ुर्ती भर गई थी और अब वे भी जल्द से जल्द मेले में पहुंच जाना चाहते थे, और कुछ ही देर में वे सब मेले में थे।

मेले के बाहरी मैदान में बैलों तथा गाड़ीयों को बांधकर जब कमला, रमेश, मुनिया तथा मोहन मेले में घुसे तो सबके मन में एक अलग ही उत्साह व्याप्त था। बच्चों ने जीभर के झुले झुले, जलेबियां खाई, मौत का कुआं देखा, कमला ने अपने लिये कुछ साज श्रंगार का समान खरीदा तो बच्चों के लिये खेल खिलौने और जब इन सब क्रिया कलापों और वस्तुओं से मन भर गया तो सब राम लीला मैदान में अपने साथ लाये चादर बिछाकर राम लीला देखने बैठ गए और राम लीला का आनंद लेने लगे।

वापसी में दोनो बच्चे बैलगाड़ी में सो चुके थे, रात्री का दुसरा प्रहर था, अम्मा बाहर बरमदे में चार पाई पर बैठी थी, पास में एक डंडा था और चारपाई से सटकर रमेश का वफ़ादार कुकुर शेरू सो रहा था।

अम्मा तु सोई नहीं ? रमेश ने पुछा ?

नहीं बेटा, अब इस बुढापे में नींद कहां आती है, और फिर तुम लोग जब तक सकुशल घर नहीं पहुंचते मुझे नींद कैसे आ सकती थी भला, अब सोने की कोशिश करती हुं और बुढीय़ा सोने का उपक्रम करने लगी।

भोर होते ही कमला जाग उठी, रात नींद पुरी नहीं होने तथा सफ़र की थकान की वजह से उसका अंग अंग दुख रहा था लेकीन उस बेचारी की किस्मत में आराम कहां? रात जल्दी सोए या देर से सुबह उठकर घर के काम काज तो उसी को निबटाने होते थे।

रमेश भी अब नहा धोकर खेत पर जाने की तैयारी करने लगा।

सुनो जी, तनिक तिवारी पंडित जी से मिलते चले जाना, पुछना अब के बरस फ़सल कैसी होगी? कमला तु भी पुरी बावरी है री, अब फ़सल के आने में भला पंडित क्या करेगा ये सब तो भगवान के हाथों में होता है, और तु भली भांती जानती है कि तिवारी पंडित की भविष्यवाणी कितनी सच होती है। खैर, कमला की जिद के आगे घुटने टेकते हुए रमेश ने कहा ठीक है पूछ लुंगा.....

कमला ने दोनों बच्चों को तैयार करके गांव की प्राथमिक शाला में पढने के लिये रवाना किया और खुद अपने कामों में लग गई. रमेश भी खेत की ओर चल दिया। कमला ने गोबर निकाला, गाय का दुध निकाला, अम्मा को चाय बना कर दी, खाना तैयार किया और पोटली में खाना बांधकर खेत की ओर चल पड़ी. सारा दिन घर के कामों में खटर-पटर करती रहती कमला के पास इतना भी वक्त नहीं था की दो घड़ी अपने आपको आइने के सामने निहार ले।

दोनों पति पत्नि खून पसीना एक करके अपने खेत को सींचते, पुरी लगन एवं मेहनत से एक एक पौधे को निखरते क्योंकि यही फ़सल, यही पौधे तो इन खेतिहर ग्रामिणों की खुशियों के हरकारे होते हैं, फ़सल अच्छी आ गई तो वारे न्यारे और बिगड़ गई तो फ़ाके......

अपनी लहलहाती फ़सल को देखकर दोनों गर्व मिश्रित खुशी से फ़ुले नहीं समा रहे थे। कमला इस बार गेहुं चने की फ़सल जोरदार हुई है, और हां वो तेरे तिवारी पंडित जी ने भी तो कहा है की इस बार हमारी फ़सल खुब लाभ देकर जाएगी...  रमेश ने कहा. शायद इस बार भगवान जी हम पर पुरी तरह मेहरबान हैं.......चरों ओर खुशियां बिखर रहीं थीं।

कमला ने पोटली से खाना निकाला। बेसन, मक्का की रोटी और मिर्ची का अचार.....दोनों ने साथ बैठकर प्रेम से खाना खाया और कुछ देर सुस्ताने की गरज से वहीं कुएं के पास पेड़ की छाया में दोनों लेट गए...

आसमान की ओर ताकते हुए रमेश बोला....

कमला, तु मेरा कितना खयाल रखती है रे.....मैं तो धन्य हो गया तेरे जैसी जोरु पाकर, न जाने कौन से पुण्य किये थे मैने पिछले जनम में जो तु मुझे मिली।

मुनिया के बापु, क्यों मुझे पाप में धकेल रहे हो इतनी तारिफ़ करके, आप भी तो मेरा कितना खयाल रखते हो....मैं भी बहुत खुश हुं, भगवान ने मुझे देवता जैसा पति दिया, प्यारे प्यारे बच्चे दिये और एक औरत को क्या चाहिये ? 

नहीं कमला तु दिन रात घर के कामों में घिसती रहती है, और मैं तो तुझे इतने सालों में एक जोड़ी झुमके भी नहीं दिला सका, लेकिन देखना अबके बरस फ़सल के बाद तुझे शहर ले जाकर तेरी पसन्द के सोने के झुमके दिलवाउंगा।

कमला मंद मंद मुस्कुराते हुए आसमान की ओर अपलक ताक रही थी, नए झुमके पहनने का खयाल ही उसे रोमांचित कर देने के लिया पर्याप्त था, कमला की तंद्रा तब टुटी जब रमेश ने प्रेमातिरेक में उसे अपने मजबूत बाहुपाश में कैद कर लिया.......अरे हटिये ये क्या कर रहे हैं आप किसी ने देख लिया तो? और झटके से खड़ी हो कर घर जाने की तैयारी करने लगी।

कमला की आहट पाते ही अम्मा ने हांक लगाई,  बहू....बहू, कहां हो ? कमला दौड़ती दौड़ती अम्मा की चारपाई के नजदिक पहुंची....हां अम्मा क्या हुआ?

अरी कुछ नहीं बहू, बहुत दिनों से हलवा नहीं खाया, बहुत मन कर रहा था, सो तेरे आने की ही बाट जोह रही थी, और हां बहु नरम नरम पुड़ीयां भी बना लेना.....ये मरी जीभ भी बहुत तंग करने लगी है, कुछ न कुछ खाने का मन करता रहता है।  

ठीक है अम्मा शाम को बना लुंगी, घर में भगवान की किरपा से दुध, घी की तो कोई कमी न थी, घर की गाय जो थी।

शाम को दोनों बच्चे शाला से लौट आए, आते ही मुनिया ने हल्ला करना शुरु कर दिया, मां, मां बहुत जोर की भुख लगी है, जल्दी खाना लाओ।

हां बेटा तुम लोग हाथ मुंह धोकर बैठो मैं अभी गर्मा गरम साग तथा पुड़ियां लेकर आती हुं। कमला ने कहा, कुछ ही देर में खेत से थक हार कर रमेश भी घर आ गया था. कमला ने सभी को खाना खीलाया।

बुढिया ने भी आज छक कर खाना खाया, कमला को ढेरों दुआएं दीं, भगवान सबको ऐसी अन्नपुर्णा बहू दे, जुग जुग जीए, फ़ुले फ़ले ...आदी और अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई।

रात दस बजे के करीब अचानक, मौसम ने रुख बदला. ठंडी हवाएं चलने लगीं, जोरदार गर्जना के साथ बिजली चमकने लगी, ठंडी हवाओं ने अब तुफ़ान का रुप ले लिया था और प्रचंड वेग से अपना रौद्र रुप दिखाने लगी। रमेश तथा कमला की नींद भी बदलों की गड़गड़ाहटों से खुल चुकी थी और दोनों खिड़की से झांकने लगे।

मौसम का रुख पल प्रतिपल भयानक हो रहा था, पुरे गांव में जैसे भुचाल आ गया था, तेज हवाएं दरख्तों को उखाड़ अपने साथ लिए जाने पर पर आमादा थीं, बारिश इतनी तेज थी की कुछ ही मिनटों में नदी नाले उफ़नने लगे, और अब कुदरत का कहर बड़े बड़े ओलों के रुप में धरती पर गिरने लगा।

उधर आसमान से ओले गिर रहे थे और इधर कमला की आंखों से जार जार आंसु.....हे भगवान अगर कुछ देर में बारिश नहीं रुकी तो पकी फ़सल खड़े खड़े बर्बाद हो जाएगी...कमला ने कहा, रमेश ने सांत्वना के स्वर में कहा..

अरे क्यों परेशान हो रही है? अभी रुक जाएगा पानी, लेकिन रुह तो अन्दर तक रमेश की भी कांप उठी थी।

बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, लगातार चार घंटे कहर बरपाने के बाद इंद्र देवता शांत हुए. आधी रात को ही कमला रमेश से खेत पर जाने की जिद करने लगी। रमेश ने समझाया, इतनी रात को, ऐसे मौसम में, इस भयावह अंधकार में हम कैसे खेत पर जायेंगे ? अभी सो जा भोर होते ही चलेंगे।

लेकिन नींद तो जैसे दोनों की बैरन बन गई थी, आधी रात आंखों में काटने के बाद सुबह होते ही दोनों खेत की ओर भागे.....भागते भागते दोनों की सांसे फ़ुल गईं थीं, और जैसे ही दोनों खेत पर पहुंचे वहां का नज़ारा देखकर दोनों की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

चार घंटे लगातार ओले गिरने से पुरी फ़सल चौपट हो चुकी थी, गेहुं की लंबी लंबी बालियां जिन्हें देखकर रमेश का सीना गर्व से दोगुना हो जाता था, आज जमीन चाट रहीं थीं, चने के गुच्छों से लदे पौधे जमीन पर चीत्त पड़े थे. खेतों पर चारों ओर ओलों के रुप में बर्फ़ फ़ैली थी।

कुछ नहीं बचा कमला......सब बर्बाद हो गया। खेतों में बर्फ़ जमी थी. बीज के लिये अनाज भी नहीं बचा.. सारी उम्मीदों, सारे सपनों पर पानी फ़िर गया।  
कमला और रमेश दोनों किंकर्तव्यविमुढ से अपनी बर्बाद फ़सल को देख रहे थे, कमला तो स्तब्ध थी लेकिन रमेश को अपनी उजड़ी फ़सल के निचे दबे एक जोड़ी सोने के झुमके दिखाई दे रहे थे...एक ऐसा सपना जो उसकी फ़सल के साथ ही बर्बाद हो गया था।

                                                                                                                    ११ मार्च २०१४                        

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अधूरा सुख

भगवान भी कभी कभी कुछ ज्यादा ही कठोरता दिखाते हैं, कहीं बाढ तो कहीं सुखा, किसी की झोली में दुनिया भर की खुशीयां तो कोई दो वक्त की रोटी को मोह्ताज, जिसको बच्चों की कोई चाहत नहीं उसको दर्जन भर बच्चे और किसी को पुरी ज़िन्दगी औलाद के लिये तरसते हुए जीना पड़ता है।

 पड़ोस में रहने वाली सुमन को मैनें हमेशा ही बच्चों के लिये तरसते हुए देखा, आठ वर्ष हो गए थे उसकी शादी को लेकिन अब तक उसे मात्रत्व का सुख प्राप्त नहीं हुआ था, वह सुख जिसके बिना स्त्री कभी अपने आप को संपूर्ण महसूस नहीं कर पाती। लेकिन सुमन की नियति मेरी समझ से कुछ परे थी, अपने बच्चे के लिये दिन रात तरसती सुमन को दुसरों के बच्चे फ़ुटी आंख नहीं सुहाते थे, रंग बिरंगे सुन्दर फ़ुलों की तरह कोलोनी में खेलते कुदते नन्हे मुन्ने बच्चे सुमन को कांटों की तरह चुभते।

एक दिन तो हद हो गई, मेरा दो वर्ष का अबोध बेटा चलते चलते उसके आंगन में सूख रहे धनिया के थाल के नजदीक पहुंच गया और धनिया के थाल के पास बैठ गया और थोड़ा सा धनिया बिखेर दिया, जैसे ही सुमन की नजर बिखरे हुए धनिया और पास ही खेल रहे मेरे बेटे पर पड़ी, उसने अपना आपा खो दिया और गुस्से में तमतमाते हुए जोर जोर से बोलने लगी, पता नहीं कैसे कैसे बच्चे पैदा कर देते हैं और लोगों के आंगन में छोड़ देते हैं। जैसे ही मेरे कानों में उसकी आवाज़ पड़ी मैनें दौड़ कर अपने बच्चे को उठाया और उसे डांटने लगी, अब इतना छोटा बच्चा भला बुरा तो कुछ समझता नहीं था सो मेरी डांट सुनकर रोने लगा।

मैनें पलटकर सुमन को सिर्फ़ इतना ही कहा  "सुमन मैने अपने बच्चे को सिखा कर नही भेजा था की वो तुम्हारा नुकसान करे" इतना सुनते ही उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और वो जोर जोर से बड़बड़ाने लगी। मैं पलटकर कहना तो चाहती थी की आपको शायद भगवान इसीलिये बच्चे नहीं देता क्योंकी आपके ह्रदय में ममता नहीं है, पर मैने अपने शब्दों को अपने मन में ही दफ़न कर दिया और यह कह्कर वहां से चल दी की मेरे बच्चे ने आपका जो नुकसान किया है उसकी भरपाई मैं आपको आपका धनिया लौटा कर कर दुंगी। उस दिन के बाद कुछ दिनों तक हम दोनों में बोलचाल बंद रही, लेकिन जल्द ही मैनें यह सोच कर की बेचारी के साथ भगवान ने अन्याय किया है, और शायद इसीलिये चिड़चिड़ी हो गई है बोलचाल चालु कर दी। मैं भी यह बात जानती थी की उसके मन में भी कोई कपट नहीं है।

सुमन हर समय मेरे सामना अपना दुखड़ा रोती रहती थी, रीना मैं क्या करुं कुछ समझ में नहीं आता कहां जाऊं सब जगह इलाज करवा लिया एलोपैथिक, आयुर्वेदिक, रुहानी झाड़ फ़ुंक, पूजा पाठ, मान मनौव्वल सब कुछ लेकिन कहीं से उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आती। हर महीने सोचती हुं काश इस महिने पीरियड नहीं आये... या फ़िर किसी महिने किसी भी कारण से पीरियड मिस होता है तो मन में आशाओं के ढेरों दिप जगमगा उठते हैं लेकिन ये खुशियां कुछ ही दिनों की मेहमान होती हैं और फिर अगले महीने का इन्तज़ार...बोलते बोलते उसका गला भर आता

मैं उसको समझाती - सुमन कभी कभी कई सालों के बाद भी उपरवाला मेहरबान होता है एक दिन वो तुम्हारी भी सुनेगा, धीरज रखो और भगवान पर विश्वास रखो मैं कभी भीउसके दुख और ईर्ष्या में अन्तर नहीं समझ नहीं पाई, वह नये नये जोड़ों को गोद में बच्चा लिये देखती तो वित्रष्णा से भर उठती, अब इसमें उसका दुख छिपा था या ईर्ष्या या शायद दोनों का मिश्रण ?

एक दिन दोपहर में सुमन बच्चों को जोर जोर से डांट रही थी। बच्चों का जुर्म यह था की वे घर के सामने खाली पड़े मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे, जिसके शोर से उसकी दोपहर की निंद खराब हो गई थी और वो बच्चों को इसका जिम्मेदार ठहरा रही थी।
कई बार इस तरह की घटनाओं से बच्चों के माता पिता को बुरा भी लगता था लेकिन सब उसकी वेदना को समझते थे और चुप रह जाते. सुमन को मैनें बहुत करिब से देखा था, उसका लड़ना झगड़ना, रोना सिसकना सब कुछ मैं समझती थी और इस निष्कर्ष पर पहुंची थी की वो दिल की भली ही थी. दर असल वह अपने दुख से इतनी ज्यादा दुखी थी की कोई उसे लाख चाहकर भी समझ नहीं पाता, हर समय बच्चे की चाहत जो अब तक सनक का रुप ले चुकी थी सुमन के दिलो दिमाग पर हावी रहती।

मैं मौका देखते ही उसके दुख को हल्का करने की गरज से उसे समझाने बैठ जाती "मेरी सलाह मानो तो एक बच्चा गोद ले लो, प्यार से पालने पोसने से तो एक कुत्ते के बच्चे से भी प्यार हो जाता है, पर वह मेरी सलाह पर ज्यादा ध्यान नहीं देती।

एक दिन सुमन छत पर खेल रहे पड़ोस के बच्चों को डांट रही थी - चलो जाओ छत पर दौड़ भाग मत करो अंकल का सर दर्द कर रहा है, मासूम बच्चे डांट सुनकर रुआंसे होकर आपस लौट गये. मैनें सुमन को टोकते हुए मजाक में कहा - सुमन अगर तुम्हें बच्चे होंगे और मस्ती करेंगे तब भैया का सर दर्द होगा तो तुम उन्हें कहां भेजोगी ? उसके पास मेरी बात का कोई जवाब नहीं था लिहाजा वह चुप ही रही।

सास ससुर भी जब कभी सुमन के घर आते तो वे भी हमेशा खुश खबरी सुनने को आतुर रहते थे, पर वे कभी सुमन को कोसते नहीं और न ही उस पर कभी कोई तानाकशी करते, भगवान की मर्जी समझ कर सब मौन रह जाते. उसके पति भी सुलझे हुए तथा समझदार व्यक्ति थे अत: वो भी कभी सुमन पर औलाद के लिये दबाव नहीं डालते थे।

सुमन अक्सर मुझसे कहती:

रीना ..मेरी फ़ैमिली कब कम्पलिट होगी ?

मैं कहती, सुमन ऐसा नहीं है जिनके बच्चे नहीं होते वे भी खुशी से जीवन जीते है।

मेरी बात को अनसुना कर वह अपनी ही रौ में कहे जाती ...हम दोनों का सहारा कौन बनेगा?

कई बार तो मैं मन ही मन झल्ला उठती कि सुमन..क्या बच्चे के अलावा तुम्हारे पास और कोई विषय नहीं है बात करने के लिये? वह मन मसोसकर चुप रह जाती।

एक दिन बड़ी प्रसन्न मुद्रा में चहकती हुई सुमन मेरे घर आई।

रीना ......रीना,  कहां हो, देखो मैं आज तुम्हारे लिये गाजर का हलुआ लाई हुं, तुम्हें बहुत पसंद है ना, कहते हुए उसने मेरे हाथों में गर्मागरम गाजर हलुआ थमा दिया और सोफ़े पर बैठ गई और बच्चा गोद लेने के विषय में बात करने लगी, मुझे बहुत खुशी हुई की चलो देर से ही सही इसे अकल तो आई।

एक दिन कलोनी की कुछ औरतें दबी जुबान में बातें कर रहीं थीं कि मैदान के पिछे वाले नाले के पास एक कपड़े में लिपटा हुआ बच्चा कोई छोड़ गया है, हाय...कैसी बेरहम मां होगी जो अपने फूल से प्यारे नवजात को मरने के लिये छोड़ गई है।

बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर कुछ भले लोगों ने बच्चे को उठा कर पुलिस स्टेशन तक पहुंचा दिया, कुछ दो चार दिन के लिये पुलिस ने थाने में ही बच्चे को सम्हालने की व्यवस्था कर दी, इस आशा में की शायद कोइ परिजन बच्चे को लेने आ जाएं, लेकिन उस अभागे बच्चे को लेने कोइ नहीं आया।

सुमन तथा उसके पति को भी यह बात पता चली तो उन्हें कहीं न कहीं अपना वर्षों का अधुरा सपना पुरा होता हुआ दिखाई दिया। वे दोनों आपसी सहमती से पुलिस थाने गए और सारी जरुरी औपचारिकतायें पुरी करके बच्चे को गोद लेकर घर ले आए, उनके लिये ज्यादा खुशी की बात यह थी की वह बच्चा लड़का था।

सुमन अब बहुत खुश नज़र आती, बच्चे की किलकारियों के साथ मुझे सुमन की भी किलकारियां सुनाई देतीं, लगता था उसका भी बचपन लौट आया था. कभी हर समय दुख के समंदर में डुबी रहने वाली सुमन अब हर समय चहकती रहती। समय अपनी गती से चलता जा रहा था। सुमन ने अपने बच्चे का नाम रखा "निनाद"।

सुमन को बेसब्री से इन्तज़ार था उस लम्हे का जब बच्चा उसे "मां" कह्कर पुकारेगा. वह शब्द जिसे सुनने के लिये सुमन ने आठ साल गम के आंसु पिए थे, उसे उम्मीद थी की जिस दिन "निनाद" उसे मां कहकर पुकारेगा शायद वह दिन वह पल उसके लिये जीवन का सबसे सुखद पल होगा। चारों दिशाओं से उस सुमधुर ध्वनि का निनाद होगा... मां...मां...मां...मां........

लेकिन यह क्या एक साल बीता, दुसरा साल बीता....निनाद तो अपने नाम के सर्वथा विपरीत खमोश ही रहा।

और एक दिन जब उसे डाक्टर के पास चेक अप के लिये ले जाया गया, तो डाक्टर ने खुलासा किया की बच्चा गुंगा है और कभी बोल नहीं पाएगा. सुमन के उपर ऐसा वज्रपात हुआ की वह आंखें फ़ाड़ फ़ाड़ कर पत्थर की मुरत बनकर डाक्टर साहब को देखती रही।

सुमन अब अपने आप को ठगा सा मह्सुस कर रही थी, न कुछ बोली और न ही रोई, निनाद को गोद में उठाकर अपनी राह चल पडी।

शायद विधाता ने उसकी किस्मत में यही लिखा था......अधुरा सुख।